
देहरादून, : उत्तराखंड ने शिक्षा के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक कीर्तिमान स्थापित किया है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 और ‘उल्लास’ (Understanding Lifelong Learning for All in Society) – नव भारत साक्षरता कार्यक्रम के मानकों को सफलतापूर्वक पूरा करने के बाद, राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह (सेवानिवृत्त) ने उत्तराखंड को ‘पूर्ण साक्षर राज्य’ घोषित करने के प्रस्ताव को अपनी आधिकारिक मंजूरी दे दी है। इस ऐतिहासिक उपलब्धि के साथ ही उत्तराखंड देश का छठा पूर्ण साक्षर राज्य बन गया है।
खबर एक नजर में :
- ऐतिहासिक गौरव: उत्तराखंड देश का छठा पूर्ण साक्षर राज्य बना। इससे पहले मिजोरम, गोवा, त्रिपुरा, हिमाचल प्रदेश और सिक्किम को यह दर्जा मिल चुका है।
- रिकॉर्ड साक्षरता दर: राज्य की साक्षरता दर 98.7% दर्ज की गई है, जो केंद्र सरकार के 95% के न्यूनतम मानक से कहीं अधिक है।
- दो साल में बड़ा बदलाव: वर्ष 2023-24 में राज्य की साक्षरता दर 83.8% थी, जिसमें पिछले दो वर्षों में 14.9% की रिकॉर्ड वृद्धि हुई है।
- उल्लास अभियान का असर: अभियान के तहत 15 वर्ष से अधिक उम्र के वयस्कों की बुनियादी शिक्षा, वित्तीय और डिजिटल साक्षरता पर विशेष काम किया गया।
राज्यपाल और मुख्यमंत्री ने दी शुभकामनाएं, बताया ‘मील का पत्थर’
राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह ने इस ऐतिहासिक उपलब्धि पर सभी प्रदेशवासियों को बधाई देते हुए इसे सामूहिक प्रयासों का प्रतिफल बताया है। वहीं, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इसे राज्य के विकास में एक बड़ा मील का पत्थर करार दिया। सीएम धामी ने कहा कि यह सफलता सरकार के नीतिगत प्रयासों और जनता की सक्रिय भागीदारी का सुंदर परिणाम है, जो ‘विकसित भारत-2047’ के संकल्प को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
केंद्रीय मानक को पछाड़कर 98.7% हुई साक्षरता दर
शिक्षा मंत्री डॉ. धन सिंह रावत ने बताया कि उत्तराखंड ने उल्लास कार्यक्रम के सभी मानकों को न केवल पूरा किया, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर एक नई मिसाल भी पेश की है।
माध्यमिक शिक्षा निदेशक डॉ. मुकुल कुमार सती के निर्देशन में कराए गए विस्तृत सर्वेक्षण के अनुसार, राज्य में 7 वर्ष से अधिक आयु की कुल पात्र आबादी लगभग 1 करोड़ 23 लाख 46 हजार आंकी गई। केंद्रीय मानकों के तहत पूर्ण साक्षर राज्य घोषित होने के लिए निरक्षरों की संख्या 5 लाख 11 हजार 731 से कम होनी चाहिए थी, लेकिन उत्तराखंड के वास्तविक सर्वेक्षण में केवल 1 लाख 31 हजार 986 व्यक्ति (मात्र 1.3%) ही निरक्षर पाए गए। इसके आधार पर प्रदेश की प्रभावी साक्षरता दर 98.7% पहुंच गई।
ऐसे तय होता है ‘पूर्ण साक्षर राज्य’ का दर्जा
केंद्र सरकार के ‘उल्लास’ कार्यक्रम के अंतर्गत 15 वर्ष या उससे अधिक आयु के निरक्षर लोगों की बुनियादी शिक्षा पर ध्यान केंद्रित किया जाता है।
- साक्षरता का नया पैमाना: नई शिक्षा नीति 2020 के तहत अब साक्षरता का अर्थ केवल पढ़ना-लिखना जानना नहीं है, बल्कि समझ के साथ पढ़ना-लिखना, बुनियादी गणितीय क्षमता, डिजिटल और वित्तीय साक्षरता भी इसका हिस्सा हैं।
- 95% का मानक क्यों? केंद्रीय नियमों के अनुसार, वृद्धावस्था, गंभीर बीमारी या बौद्धिक अक्षमता जैसी अपरिहार्य परिस्थितियों के कारण शत-प्रतिशत (100%) व्यावहारिक साक्षरता संभव नहीं होती। इसलिए, यदि किसी राज्य में यह दर 95% या उससे अधिक हो जाती है, तो उसे ‘पूर्ण साक्षर’ घोषित कर दिया जाता है।
वंचित तबकों और महिलाओं पर रहा विशेष ध्यान
शिक्षा मंत्री डॉ. धन सिंह रावत के अनुसार, उल्लास अभियान की सफलता के पीछे जमीनी स्तर पर हुआ योजनाबद्ध कार्य है। अभियान के तहत:
- सामाजिक संस्थाओं, कॉर्पोरेट घरानों और जागरूक नागरिकों के सहयोग से गांवों को गोद लिया गया।
- मुख्य रूप से महिलाओं, अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य समाज के वंचित वर्गों को साक्षर बनाने पर ध्यान केंद्रित किया गया।
- उन ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों को प्राथमिकता दी गई, जहां महिला साक्षरता की दर पूर्व में 60 प्रतिशत से कम थी।
विद्यालयी शिक्षा सचिव रवीनाथ रमन और महानिदेशक आकांक्षा कोंडे ने भी इस सफलता का श्रेय प्रदेश के शिक्षकों, स्वयंसेवकों, स्थानीय निकायों और विभाग के अधिकारियों की कड़ी मेहनत को दिया है। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में बचे हुए निरक्षर लोगों को भी मुख्यधारा से जोड़कर आजीवन सीखने के अवसरों को और मजबूत किया जाएगा।
