
पौराण काल की बात है, स्वर्ग और पृथ्वी पर अनलासुर नाम के एक राक्षस ने भारी आतंक मचा रखा था। अनलासुर कोई साधारण राक्षस नहीं था; उसका शरीर अग्नि (आग) जैसा धधक रहा था और उसकी आँखों से अंगारे बरसते थे। वह जहाँ भी जाता, सब कुछ जलाकर भस्म कर देता था।
उसकी शक्ति के आगे इंद्रदेव सहित सभी देवता हार मान चुके थे। ऋषि-मुनि और देवता, सभी अनलासुर के भय से कांप रहे थे। कोई भी शस्त्र उस अग्नि रूपी राक्षस का वध नहीं कर पा रहा था। निराश होकर सभी देवता भगवान शिव और विष्णु के पास गए, लेकिन समस्या का हल नहीं मिला। अंततः, सभी ने विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश की शरण ली और उनसे रक्षा की प्रार्थना की।
देवताओं की पुकार सुनकर भगवान गणेश ने अनलासुर का अंत करने का निर्णय लिया। रणभूमि में गणेशजी और अनलासुर का सामना हुआ। अनलासुर ने गणेशजी को जलाने के लिए अपनी पूरी शक्ति लगा दी, लेकिन बाल गणेश ने अपना विराट रूप धारण कर लिया। इससे पहले कि अनलासुर कुछ समझ पाता, गणेशजी ने उसे जिंदा निगल लिया।
अनलासुर के पेट में जाते ही उसका अंत तो हो गया, लेकिन गणेशजी के शरीर में भीषण जलन होने लगी। चूंकि अनलासुर अग्नि का प्रतीक था, इसलिए गणेशजी का पेट भट्टी की तरह तपने लगा। देवताओं ने उन्हें ठंडक पहुँचाने के लिए उन पर चंद्रमा की किरणें डालीं, शरीर पर चंदन का लेप लगाया, लेकिन किसी भी उपाय से गणेशजी के पेट की जलन शांत नहीं हुई।
गणेशजी की पीड़ा देखकर वहां उपस्थित ऋषियों ने एक उपाय सोचा। उन्होंने पास ही उगी हुई दूर्वा (दूब घास) को उखाड़ा और उसे साफ पानी से धोकर गणेशजी को खाने के लिए दिया। जैसे ही गणेशजी ने वह दूर्वा खाई, चमत्कार हो गया। उनके पेट की जलन तुरंत शांत हो गई और उन्हें शीतलता का अनुभव हुआ।
प्रसन्न होकर गणेशजी ने कहा, “आज इस साधारण सी दिखने वाली दूर्वा ने मेरी पीड़ा हरी है। इसलिए, आज से जो भी भक्त मुझे श्रद्धा के साथ दूर्वा अर्पित करेगा, उसके सभी विघ्न दूर होंगे और मेरी विशेष कृपा उस पर बनी रहेगी।”
बस तभी से भगवान गणेश को दूर्वा चढ़ाने की परंपरा शुरू हो गई।
कैसे चढ़ाएं दूर्वा?
इस कथा के सम्मान में, आज भी भक्त गणेशजी को प्रसन्न करने के लिए दूर्वा अर्पित करते हैं। लेकिन इसे चढ़ाने का एक विशेष नियम है:
- स्वच्छता: दूर्वा हमेशा मंदिर के बगीचे या किसी साफ जगह से ही तोड़ें। गंदे पानी वाली जगह से दूर्वा न लें। चढ़ाने से पहले उसे साफ पानी से धो लें।
- दूर्वा का जोड़ा: गणेशजी को एक-एक करके नहीं, बल्कि जोड़े में दूर्वा चढ़ाई जाती है।
- संख्या: कुल 22 दूर्वा लें और उन्हें मिलाकर 11 जोड़े तैयार करें।
- मंत्र जाप: इन 11 जोड़ों को गणेशजी के मस्तक या चरणों में अर्पित करते समय नीचे दिए गए 11 मंत्रों का जाप करें:
- ऊँ गं गणपतेय नम:
- ऊँ गणाधिपाय नमः
- ऊँ उमापुत्राय नमः
- ऊँ विघ्ननाशनाय नमः
- ऊँ विनायकाय नमः
- ऊँ ईशपुत्राय नमः
- ऊँ सर्वसिद्धिप्रदाय नमः
- ऊँ एकदन्ताय नमः
- ऊँ इभवक्त्राय नमः
- ऊँ मूषकवाहनाय नमः
- ऊँ कुमारगुरवे नमः
इस विधि से दूर्वा चढ़ाने पर भगवान गणेश अत्यंत प्रसन्न होते हैं और भक्त की मनोकामना पूर्ण करते हैं।
