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कॉर्बेट के जंगलों में ‘महिला शक्ति’ की दहाड़: बाघों की गिनती में अहम भूमिका निभा रहीं वन वीरांगनाएं, हाईटेक तरीके से हो रहा सर्वे

रामनगर: विश्व प्रसिद्ध जिम कॉर्बेट टाइगर रिजर्व में इन दिनों बाघों के संरक्षण और उनकी संख्या जानने के लिए ‘ऑल इंडिया टाइगर एस्टीमेशन’ (अखिल भारतीय बाघ आकलन) का कार्य युद्धस्तर पर जारी है। दुनिया की सबसे बड़ी इस वाइल्डलाइफ एक्सरसाइज में जहाँ आधुनिक विज्ञान और तकनीक का इस्तेमाल हो रहा है, वहीं सबसे खास बात है इसमें ‘महिला शक्ति’ की भागीदारी। कॉर्बेट के दुर्गम और खतरनाक रास्तों पर महिला वनकर्मी न केवल गश्त कर रही हैं, बल्कि बाघों की सटीक गणना में एक नई मिसाल भी कायम कर रही हैं।

दुर्गम रास्तों पर हौसले की उड़ान
इस महाअभियान में महिला वनकर्मी पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं। महिला वन दरोगा मानसी अरोड़ा अपनी टीम के साथ जंगल के भीतर सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। मानसी बताती हैं कि बाघों की गिनती केवल कैमरे लगाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके लिए जंगल के चप्पे-चप्पे को छानना पड़ता है।

उन्होंने बताया, “हमें जंगल के भीतर कई किलोमीटर पैदल चलकर बाघों के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष संकेत जुटाने पड़ते हैं। यह काम चुनौतीपूर्ण है, लेकिन हमारी टीम पूरे उत्साह के साथ इसे कर रही है।” उनके साथ रेंज अधिकारी नवीन चंद्र पांडे, रमन सिंह और मोहन उप्रेती जैसे अनुभवी वनकर्मी भी इस कठिन कार्य में शामिल हैं।

गिनीज बुक में दर्ज है यह महाअभियान
बाघों की यह गणना दुनिया का सबसे बड़ा वन्यजीव सर्वेक्षण मानी जाती है, जिस कारण इसका नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में भी दर्ज है। कॉर्बेट प्रशासन ने इसके लिए कई विशेष टीमें गठित की हैं। पार्क के निदेशक डॉ. साकेत बडोला के अनुसार, पूरी प्रक्रिया वैज्ञानिक और पारदर्शी तरीके से तीन चरणों में संपन्न होती है।

तीन चरणों में ऐसे हो रही है बाघों की गिनती:

  1. पहला चरण (साइन सर्वे): इसमें वनकर्मी पूरे क्षेत्र में घूमकर बाघों के पगमार्क (पदचिन्ह), मल (scat), और पेड़ों पर खरोंच के निशान जैसे साक्ष्य जुटाते हैं। यह सारा डेटा ‘इकोलॉजी ऐप’ और ‘एम-स्ट्राइप्स’ (M-STrIPES) ऐप पर डिजिटल रूप में दर्ज किया जाता है।
  2. दूसरा चरण (ट्रांजिट वॉक): इस चरण में शाकाहारी जानवरों (बाघों का भोजन) की स्थिति का आकलन होता है। वनकर्मी जीपीएस, रेंज फाइंडर और कम्पास के साथ निर्धारित 2 किलोमीटर की ‘ट्रांजिट लाइन’ पर चलते हैं। एक बीट में वनकर्मी 5 से 15 किलोमीटर तक पैदल चलकर डेटा एकत्र करते हैं।
  3. तीसरा चरण (कैमरा ट्रैपिंग): यह अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण चरण है। डॉ. बडोला ने बताया कि पूरे कॉर्बेट क्षेत्र (नेशनल पार्क और कालागढ़) में 1050 से अधिक कैमरा ट्रैप लगाए गए हैं। केंद्र सरकार के दिशानिर्देशों के मुताबिक, 550 से अधिक पॉइंट्स पर ये कैमरे 45 दिनों तक सक्रिय रहेंगे।

AI और सॉफ्टवेयर से होगी बाघों की पहचान
निदेशक डॉ. साकेत बडोला ने बताया कि कैमरा ट्रैप से मिली तस्वीरों को पहले एआई (AI) आधारित सॉफ्टवेयर से छांटा जाता है। इसके बाद ‘एक्सट्रैक्ट-कम्पेयर’ (Extract-Compare) सॉफ्टवेयर के जरिए बाघों की धारियों (Stripes) का मिलान कर उनकी विशिष्ट पहचान की जाती है। इससे यह पता चलता है कि कौन सा बाघ किस क्षेत्र में सक्रिय है।

फिलहाल कॉर्बेट में ट्रांजिट लाइन और वॉक का कार्य पूरा हो चुका है और कैमरा ट्रैपिंग का कार्य अंतिम चरण में है। इस सर्वे के नतीजे न केवल भारत बल्कि वैश्विक स्तर पर बाघ संरक्षण की दिशा तय करेंगे।

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