Categories: Blog

महादानी कर्ण और देवराज इंद्र का छल

महाभारत के युद्ध की रणभेरी बजने ही वाली थी। कौरवों और पांडवों की सेनाएं आमने-सामने थीं, लेकिन भगवान श्री कृष्ण के माथे पर चिंता की लकीरें थीं। वे भली-भांति जानते थे कि कौरव सेना का सबसे बड़ा योद्धा ‘कर्ण’ है। कर्ण सूर्यपुत्र थे और जन्म से ही उन्हें अभेद्य ‘कवच’ और ‘कुंडल’ प्राप्त थे। कृष्ण को यह ज्ञात था कि जब तक कर्ण के शरीर पर ये कवच और कुंडल हैं, तब तक तीनों लोकों में कोई भी अस्त्र-शस्त्र उनका वध नहीं कर सकता। ऐसे में अर्जुन की सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं थी।

उधर, स्वर्ग में बैठे देवराज इन्द्र भी घोर चिंता में डूबे थे। अर्जुन उनका पुत्र था और कर्ण ने प्रतिज्ञा ले रखी थी कि वह युद्ध में अर्जुन का वध करके ही दम लेगा। पुत्र मोह में व्याकुल इंद्र भगवान कृष्ण की शरण में पहुंचे। दोनों ने मिलकर विचार किया कि यदि अर्जुन को बचाना है, तो कर्ण को उन दिव्य कवच-कुंडलों से अलग करना ही होगा। अंततः एक योजना बनाई गई।

अगली सुबह, कर्ण अपने नियम के अनुसार नदी किनारे सूर्यदेव की आराधना कर रहे थे। पूजा समाप्त होने के बाद वे ब्राह्मणों और याचकों को दान दे रहे थे। कर्ण की ख्याति थी कि पूजा के बाद वे किसी भी याचक को खाली हाथ नहीं लौटाते थे।

तभी वहां एक वृद्ध और तेजस्वी ब्राह्मण का आगमन हुआ। यह कोई और नहीं, बल्कि वेश बदल कर आए स्वयं देवराज इंद्र थे।

कर्ण ने नतमस्तक होकर पूछा, “प्रणाम विप्रवर! आदेश करें, मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ?”

छद्म वेश में इंद्र ने कहा, “राजन! मैं तुमसे भिक्षा मांगना चाहता हूँ, लेकिन मुझे भय है कि कहीं तुम मना न कर दो।”

कर्ण मुस्कुराए, “विप्रवर! मैं सूर्यपुत्र कर्ण हूँ। मेरे द्वार से आज तक कोई खाली हाथ नहीं गया। आप निसंकोच मांगें।”

इंद्र ने चतुराई दिखाते हुए कहा, “नहीं राजन! पहले आप वचन दें कि मैं जो मांगूंगा, आप वही देंगे।”

कर्ण ने तैश में आकर तुरंत अपने कमंडल से जल हाथ में लिया और सूर्यदेव की ओर देखते हुए कहा, “मैं प्रण करता हूँ विप्रवर! आप जो भी मांगेंगे, मैं उसी क्षण आपको प्रदान करूँगा। अब विलंब न करें, मांगिए।”

ब्राह्मण रूपी इंद्र की आंखों में चमक आ गई। उन्होंने कहा, “हे दानवीर! यदि आप सत्यवादी हैं, तो मुझे दान में अपने शरीर के यह ‘कवच’ और ‘कुंडल’ दे दीजिए।”

यह सुनते ही वहां सन्नाटा छा गया। यह मांग प्राण मांगने के समान थी। कर्ण ने एक पल के लिए उस ब्राह्मण की आंखों में झांका। कर्ण समझदार थे, वे तुरंत भांप गए कि यह साधारण ब्राह्मण नहीं, बल्कि अर्जुन के प्राण बचाने आए देवराज इंद्र हैं। कर्ण यह भी जानते थे कि कवच-कुंडल देते ही उनकी मृत्यु निश्चित हो जाएगी।

किंतु, कर्ण तो महादानी थे। रघुकुल की तरह उनकी भी रीति थी—’प्राण जाए पर वचन न जाए।’

कर्ण ने एक क्षण भी नहीं गंवाया। उन्होंने पास ही रखा एक तीखा खंजर उठाया। बिना किसी पीड़ा के भाव के, उन्होंने अपने शरीर से जुड़े मांस को चीरते हुए कवच और कुंडल अलग कर दिए। उनका शरीर रक्त से सन गया, लेकिन चेहरे पर वही सौम्य मुस्कान थी। उन्होंने वे रक्तरंजित कवच और कुंडल ब्राह्मण के हाथों में सौंप दिए।

अपना मनोरथ सिद्ध होते ही इंद्र ने वहां से दौड़ लगा दी। वे अपनी चतुरता पर प्रसन्न थे कि उन्होंने अपने पुत्र के सबसे बड़े शत्रु को कमजोर कर दिया। वे दूर खड़े अपने रथ पर सवार हुए और भागने लगे।

लेकिन, नियति सब देख रही थी। इंद्र का रथ कुछ ही मील गया होगा कि अचानक वह नीचे उतरकर भूमि में धंसने लगा। इंद्र ने बहुत प्रयास किया, पर रथ टस से मस न हुआ।

तभी आकाशवाणी हुई, “ठहर जा देवराज इंद्र! तूने यह बहुत बड़ा पाप किया है। अपने पुत्र अर्जुन की जान बचाने के लिए तूने छलपूर्वक एक महादानी के प्राण संकट में डाल दिए हैं। तूने एक भक्त के विश्वास का लाभ उठाया है। तेरा यह रथ अब यहीं धंसा रहेगा और तू भी इसी के साथ यहीं धंस जाएगा।”

आकाशवाणी सुनकर इंद्र कांप उठे। उन्हें अपनी भूल का अहसास हुआ। वे लज्जित होकर पुनः कर्ण के पास लौटे (कुछ कथाओं के अनुसार उसी समय आकाशवाणी के बाद उन्होंने वरदान दिया)।

इंद्र ने कर्ण से कहा, “हे कर्ण! तुम वास्तव में महान हो। तुम्हारे जैसा दानी इस संसार में न कोई हुआ है और न होगा। मैंने छल किया, लेकिन तुमने उदारता दिखाई। मैं तुम्हारे कवच-कुंडल तो वापस नहीं दे सकता, लेकिन इसके बदले मैं तुम्हें अपनी सबसे शक्तिशाली ‘अमोघ शक्ति’ (एकाघ्नी) प्रदान करता हूँ। तुम जिस पर भी इसका प्रहार करोगे, उसकी मृत्यु निश्चित होगी। परंतु ध्यान रहे, इसका प्रयोग तुम केवल एक बार ही कर सकोगे।”

कर्ण ने वह शक्ति स्वीकार कर ली। इस प्रकार, कर्ण ने अपने प्राणों का मोह त्याग कर अपनी दानवीरता को अमर कर दिया और संसार में ‘दानवीर कर्ण’ के नाम से पूजनीय हुए।

Tv10 India

Recent Posts

उत्तराखंड में शिक्षा व्यवस्था में बड़ा बदलाव: मदरसा बोर्ड खत्म, नया प्राधिकरण गठित

देहरादून: उत्तराखंड में मदरसा बोर्ड खत्म होगा, सरकार ने राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण गठित कर…

13 hours ago

सीएम की समीक्षा बैठक के बाद बड़ा फैसला, निवेश प्रस्तावों की ग्राउंडिंग तेज होगी

देहरादून। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि वैश्विक निवेशक सम्मेलन में हुए एमओयू के…

13 hours ago

Mussoorie: प्रसिद्ध यात्रा लेखक पद्मश्री ह्यू गैंटज़र का निधन

मसूरी। प्रसिद्ध यात्रा लेखक और पद्मश्री सम्मानित ह्यू गैंटज़र का मंगलवार को 94 वर्ष की…

13 hours ago

रेल बजट में उत्तराखंड को बड़ी राहत: 4,769 करोड़ रुपये से रफ्तार पकड़ेंगी परियोजनाएं

देहरादून: रेल बजट से उत्तराखंड को इस साल 4,769 करोड़ रुपये मिलेंगे। इससे ऋषिकेश-कर्णप्रयाग समेत…

2 days ago

Union Budget 2026: सीएम धामी ने केंद्रीय बजट को बताया ‘विकसित भारत’ का आधार

देहरादून | मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने आज संसद में पेश किए गए केंद्रीय बजट 2026-27…

3 days ago

मनरेगा से बेहतर वीबी जी रामजी योजना बेहतर, कांग्रेस का राम नाम का विरोध पुराना: रेखा

नानकमत्ता में वीबीजी रामजी योजना पर जिला सम्मेलन का आयोजनटीवी 10 इंडिया मीडिया नेटवर्कनानकमत्ता। कैबिनेट…

3 days ago