भौरों के भविष्य के खतरों का अध्ययन: वैज्ञानिकों ने एक अध्ययन रिपोर्ट में भौरों के भविष्य के खतरों को चेताया है। इस अध्ययन के अनुसार, 2050 से 2070 तक, भौरे अपने प्राकृतिक वास का बड़ा हिस्सा खो देंगे। जिनके मात्र 15% आवास सुरक्षित रहेंगे।
देहरादून:उत्तराखंड के भौरे यानी हिमालयी क्षेत्र में भंवरों (बम्बलबीज) की स्थिति चिंताजनक है। जलवायु परिवर्तन और हिमालयी क्षेत्र में बढ़ती मानव गतिविधियों के कारण ये भंवर खतरे में हैं। इन दिनों पहाड़ों में जंगली फूलों की भी बहार रहती है। चारों ओर छाई हरियाली और कई प्रकार के खिले फूल प्रकृति से जुड़े होते हैं. इस त्योहार में बच्चों की एक खास भूमिका होती है, जो लोगों को और तमाम घरों को एक दूसरे से जोड़ते हैं। बच्चे ही इस त्योहार की वो कड़ी हैं जो लोगों को और घरों को एक साथ बांधते हैं और खूबसूरती के साथ घर सजाते हुए इस त्योहार को मनाते हैं। फूलदेई एक ऐसा त्योहार है जो चैत्र संक्रांति से लेकर अप्रैल वाली बैशैखी तक मानाया जाता है। इस त्योहार में बच्चे फूल तोड़कर लाते हैं और पारंपरिक पोषाकों में लोकगीत गाते हुए इन फूलों को हर घर की देहरी पर रखते हैं। ऐसे करते हुए बच्चे हर घर तक जाते हैं और पूरे गांव सजा देते हैं। इस दिन घोघादेवी की पूजा की जाती है। फ्योंली और बुरांस के फूलों को देहरी पर रखने की परंपरा है, जिसे माना जाता है कि ये घर में खुशहाली लाते हैं
भौरों के भविष्य के खतरों का अध्ययन: वैज्ञानिकों ने एक अध्ययन रिपोर्ट में भौरों के भविष्य के खतरों को चेताया है। इस अध्ययन के अनुसार, 2050 से 2070 तक, भौरे अपने प्राकृतिक वास का बड़ा हिस्सा खो देंगे। जिनके मात्र 15% आवास सुरक्षित रहेंगे।
यह समस्या जलवायु परिवर्तन और हिमालयी क्षेत्र में बढ़ती मानव गतिविधियों के कारण हो रही है। विशेषज्ञों ने 32 प्रजातियों के भौरों की अध्ययन की है, जो हिमालय क्षेत्र में पाए जाते हैं।
प्रमुख कारण:
भौरों के उपयुक्त आवास की स्थिति:
2050 तक भौरों के निवास स्थान में तेजी से घटाव:
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के सहयोग से अध्ययन
भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के सहयोग से भारतीय वन्यजीव संस्थान के पूर्व वरिष्ठ वैज्ञानिक डाॅ. वीपी उनियाल के निर्देशन में भारतीय वन्य जीव संस्थान के वैज्ञानिकों ने वर्ष 2021 से 2023 तक हिमालयी क्षेत्र के भौरों की 32 प्रजातियों पर अध्ययन किया। अध्ययन से यह पता चला है कि भौरों का आवास संकटग्रस्त श्रेणी में आ चुका है।
यही हाल रहा तो आने वाले समय में भौरों के आवास धीरे-धीरे समाप्त हो जाएंगे और हिमालयी क्षेत्र में होने वाले सुंदर फूलों में परागण की प्रक्रिया न होने से फूल नहीं खिल पाएंगे। -डाॅ. वीपी उनियाल, पूर्व वरिष्ठ वैज्ञानिक भारतीय वन्यजीव संस्थान
फूलदेई एक प्रसिद्ध उत्तराखंड का लोक पर्व है
फूलदेई उत्तराखंड का प्रमुख त्योहार है,जो प्रत्येक वर्ष चैत्र मास की संक्रांति को मनाया जाता है। इस दिन बच्चे अपने प्रिय फूलों को तोड़कर घर-घर जाकर फैलाते हैं। इसे लोक बाल पर्व भी कहा जाता है। फूलदेई के दौरान बच्चों की भूमिका बड़ी महत्वपूर्ण होती है। यह त्योहार नववर्ष की शुरुआत के रूप में मनाया जाता है और उत्तराखंड के पहाड़ों में अनेक प्रकार के सुंदर फूल खिलते हैं।
इस त्योहार को फूलदेई के नाम से जाना जाता है। यह लोकपर्व बताता है कि प्रकृति के बिना इंसान का कोई वजूद नहीं है। इसे कुमाऊं में ‘फूलदेई’ और गढ़वाल में ‘फूल संक्रांति’ कहते हैं। यह त्योहार बसंत ऋतु के स्वागत के तौर पर भी मनाया जाता है। इस दौरान बच्चों की टोली थाली को सजाकर उसमें चावल, फूल और गुड़ रखती है और आसपास के घरों में जाकर मुख्य द्वार की चौखट पर फूलदेई करते हैं। यानी देहली पर अक्षत और फूल फेंकते हैं और घरों की खुशहाली की कामना करते हैं। इस पूरी रस्म के दौरान वे लोकगीत भी गाते हैं। यह लोक गीत है:
“फूलदेई छम्मा देई, दैणी भरभंकार, यो देली सो बारम्बार, फूलदेई छम्मा देई, जातुके देला उतुके सई।” इस त्योहार में बच्चों का खास महत्व होता है, जो लोगों को और तमाम घरों को एक साथ बांधते हैं और खूबसूरती के साथ घर सजाते हुए इस त्योहार को मनाते हैं।
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