
देहरादून। उत्तराखंड की धामी सरकार ने राज्य में अल्पसंख्यकों की आर्थिक, शैक्षणिक और सामाजिक स्थिति का विस्तृत रिकॉर्ड तैयार करने का बड़ा निर्णय लिया है। इसके लिए सरकार ने एक 7 सदस्यीय उच्च स्तरीय समिति का गठन किया है, जो राज्य स्थापना (वर्ष 2000) से लेकर अब तक, यानी पिछले 25 वर्षों में अल्पसंख्यकों के हालातों में आए बदलावों का गहन अध्ययन करेगी। हालांकि, सरकार के इस कदम पर विपक्षी दलों और अल्पसंख्यक संगठनों ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कई आशंकाएं व्यक्त की हैं।
रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में बनी 7 सदस्यीय समिति
अल्पसंख्यक कल्याण के लिए गठित इस उच्च स्तरीय समिति की कमान रिटायर्ड जज अखिलेश चंद शर्मा को सौंपी गई है। समिति में विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों को शामिल किया गया है:
- अध्यक्ष: रिटायर्ड जज अखिलेश चंद शर्मा।
- सदस्य: रिटायर्ड आईएएस अधिकारी शत्रुघ्न सिंह, दून विश्वविद्यालय की कुलपति सुरेखा डंगवाल, विषय विशेषज्ञ मनु गौड़, अल्पसंख्यक आयोग की उपाध्यक्ष फरजाना बेगम और समाजसेवी राजपाल सिंह।
- सदस्य सचिव: निदेशक, अल्पसंख्यक कल्याण विभाग।
अध्ययन का मुख्य उद्देश्य
यह समिति पिछले ढाई दशकों में अल्पसंख्यक समाज की आर्थिक और शैक्षणिक प्रगति के साथ-साथ उनके सांस्कृतिक बदलावों की भी समीक्षा करेगी। समिति अपनी विस्तृत रिपोर्ट आंकड़ों के आधार पर तैयार कर मुख्यमंत्री को सौंपेगी। सरकार का तर्क है कि इस रिपोर्ट के आधार पर भविष्य में अल्पसंख्यकों के लिए विकास योजनाओं और कल्याणकारी कार्यों की रूपरेखा निर्धारित की जाएगी।
विपक्ष ने उठाए सवाल: “हिडन एजेंडा” का आरोप
सरकार के इस फैसले पर राज्य में राजनीतिक पारा चढ़ गया है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल इसे आगामी विधानसभा चुनाव और स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) से जोड़कर देख रहे हैं।
- कांग्रेस का रुख: कांग्रेस नेत्री सुजाता पॉल ने इसे भाजपा का ‘हिडन एजेंडा’ करार दिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार SIR के जरिए मुस्लिम समाज के नाम मतदाता सूची से काटना चाहती है और इस डेटा का उपयोग उनके शोषण और उनके खिलाफ माहौल बनाने के लिए किया जा सकता है।
- जन अधिकार पार्टी की आपत्ति: जन अधिकार पार्टी के अध्यक्ष आजाद अली ने इसे एक ‘षड्यंत्र’ बताते हुए कहा कि भाजपा हमेशा से अल्पसंख्यक विरोधी रही है। उन्होंने आशंका जताई कि यह समिति गुपचुप तरीके से अल्पसंख्यकों के अधिकार छीनने की भूमिका तैयार कर रही है।
सरकार और वक्फ बोर्ड का पक्ष
विपक्ष के आरोपों को खारिज करते हुए सरकार और उसके समर्थकों ने इसे विकासोन्मुखी कदम बताया है।
- अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री खजानदास ने कहा कि अल्पसंख्यकों की वास्तविक स्थिति जानने के बाद ही सरकार उनके उत्थान के लिए बेहतर निर्णय ले पाएगी। यह अध्ययन केवल पारदर्शी रिकॉर्ड तैयार करने के लिए है।
- वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष शादाब शम्स ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि विपक्षी दल बेवजह नकारात्मकता फैला रहे हैं। उन्होंने कहा कि अल्पसंख्यक समाज सरकार की योजनाओं का लाभ ले रहा है और कांग्रेस केवल लोगों को बांटने की कोशिश कर रही है।
निष्कर्ष
धामी सरकार का यह कदम राज्य की राजनीति में एक नई बहस को जन्म दे चुका है। जहां सरकार इसे ‘सशक्तिकरण का आधार’ बता रही है, वहीं विपक्ष इसे ‘राजनीतिक हथियार’ मान रहा है। अब सबकी नजरें समिति की रिपोर्ट और उसके बाद सरकार द्वारा उठाए जाने वाले कदमों पर टिकी हैं।
