
न्यूज हाइलाइट्स (Focus Box):
- आयोजन: मां बाल सुंदरी देवी मंदिर परिसर, काशीपुर।
- मुख्य आकर्षण: 10 लाख रुपये की कीमत का घोड़ा (मालिक: सरनजीत सिंह)।
- ऐतिहासिक महत्व: सुल्ताना डाकू और फूलन देवी जैसी शख्सियतों से जुड़ी हैं कहानियां।
- नस्लें: मारवाड़ी, अरबी, सिंधी, अफगानी और पंजाबी घोड़ों का बाजार।
- विरासत: 140 साल पुरानी व्यापारिक परंपरा।
काशीपुर (उधम सिंह नगर)। उत्तराखंड के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक गौरव का प्रतीक ‘चैती मेला’ एक बार फिर अपनी पूरी भव्यता के साथ शुरू हो गया है। काशीपुर की मां बाल सुंदरी देवी मंदिर परिसर में लगने वाला यह मेला न केवल आस्था का केंद्र है, बल्कि अपने प्रसिद्ध ‘नखासा बाजार’ (घोड़ा बाजार) के लिए पूरे उत्तर भारत में जाना जाता है। इस वर्ष मेले का मुख्य आकर्षण 10 लाख रुपये की कीमत वाला एक शानदार घोड़ा है।
लाखों की नस्लों से गुलजार हुआ नखासा बाजार
मेले के नखासा बाजार में देशभर से व्यापारी अपनी बेहतरीन नस्लों के घोड़े लेकर पहुंचे हैं। इस बार बाजार में सिंधी, अरबी, मारवाड़ी, काठियावाड़ी, पंजाबी और अफगानी नस्लों के घोड़ों का जमावड़ा लगा है।
- सबसे महंगा घोड़ा: इस सीजन का सबसे महंगा घोड़ा करीब 10 लाख रुपये का है। इसे काशीपुर के कुंडा क्षेत्र (बैतवाला) निवासी सरनजीत सिंह बिक्री के लिए लाए हैं।
- परख की परंपरा: खरीदार घोड़ों की चाल, उनकी क्षमता और करतब देखकर सौदेबाजी कर रहे हैं।
इतिहास और डाकुओं की कहानियों से नाता
चैती मेले के घोड़ा बाजार का इतिहास करीब 140 साल पुराना है। स्थानीय मान्यताओं और किंवदंतियों के अनुसार, एक दौर में यह मेला कुख्यात डाकुओं की पसंदीदा जगह हुआ करता था।
- सुल्ताना डाकू: कहा जाता है कि सुल्ताना डाकू अपने गिरोह के लिए सबसे तेज तर्रार घोड़े यहीं से खरीदता था। इसी क्षेत्र में अंग्रेज अधिकारी मिस्टर यंग ने उसे गिरफ्तार किया था।
- फूलन देवी और मलखान सिंह: चर्चाएं हैं कि फूलन देवी ने भी यहां मां बाल सुंदरी के दर्शन किए थे और घोड़ा खरीदा था।
- सेना का कनेक्शन: ब्रिटिश काल में मेरठ, बाबूगढ़ और रानीखेत जैसी सैन्य छावनियों के लिए भी यहीं से घोड़ों की खरीदारी की जाती थी।
बदलता स्वरूप और चुनौतियां
भले ही आज भी परंपरा जारी है, लेकिन बदलते दौर का असर बाजार पर दिख रहा है। व्यापारियों का कहना है कि पहले की तुलना में अब खरीदारों की संख्या और घोड़ों की विविध नस्लों में कमी आई है। 19 मार्च से शुरू हुए इस मेले में इस बार बाजार थोड़ा शांत है, फिर भी शौकीनों के लिए यह आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।
आस्था और व्यापार का अनूठा संगम
चैत्र मास की नवरात्रि के दौरान आयोजित होने वाला यह 15 दिवसीय मेला धर्म, इतिहास और व्यापार का एक दुर्लभ मिश्रण है। जहां श्रद्धालु मां बाल सुंदरी के दरबार में मत्था टेकने आते हैं, वहीं नखासा बाजार मेले को एक अलग रोमांचक पहचान देता है।
