
नई दिल्ली: आज, 30 दिसंबर 2025 (मंगलवार) को पौष पुत्रदा एकादशी का पावन पर्व मनाया जा रहा है। यह व्रत विशेष रूप से उन दंपतियों के लिए वरदान माना जाता है, जो संतान सुख से वंचित हैं। मान्यता है कि इस कथा को स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को सुनाया था।
पौष पुत्रदा एकादशी की पौराणिक कथा:
प्राचीन काल में भद्रावती नाम की एक सुंदर नगरी थी, जहाँ राजा सुकेतुमान राज्य करते थे। उनकी पत्नी का नाम रानी शैव्या था। राजा के पास धन-धान्य, वैभव और शक्ति की कोई कमी नहीं थी, लेकिन फिर भी राजा और रानी के मन में गहरा दुख था। यह दुख था—नि:संतान होने का।
राजा को हमेशा यह चिंता सताती थी कि उनके बाद उनका पिंडदान कौन करेगा? राजा के पितर (पूर्वज) भी यह सोचकर दुखी रहते थे और रो-रोकर पिंड ग्रहण करते थे कि सुकेतुमान के बाद उन्हें पिंड देने वाला कोई नहीं बचेगा। इस चिंता में राजा का मन राजकाज में भी नहीं लगता था। निराशा इतनी बढ़ गई कि एक बार राजा ने आत्महत्या करने का विचार कर लिया, लेकिन आत्मघात को महापाप समझकर उन्होंने यह विचार त्याग दिया।
एक दिन मन की शांति के लिए राजा अपना घोड़ा लेकर वन की ओर निकल पड़े। वन में भटकते हुए दोपहर हो गई और राजा को तीव्र प्यास लगी। पानी की तलाश में वे इधर-उधर भटकने लगे। तभी उन्हें थोड़ी दूर पर एक सुंदर सरोवर दिखाई दिया। सरोवर कमल के पुष्पों से भरा था और वहां सारस-हंस क्रीड़ा कर रहे थे।
सरोवर के किनारे राजा ने देखा कि वहां कई मुनियों के आश्रम बने हुए हैं। जैसे ही राजा वहां पहुंचे, उनके शरीर का दाहिना अंग फड़कने लगा, जिसे उन्होंने शुभ शकुन माना। राजा घोड़े से उतरे और मुनियों को दंडवत प्रणाम किया।
राजा की विनम्रता देखकर मुनि प्रसन्न हुए और बोले, “हे राजन! हम तुमसे प्रसन्न हैं, अपनी इच्छा कहो।”
राजा ने पूछा, “हे मुनिवरों, आप कौन हैं और यहाँ किस प्रयोजन से आए हैं?”
मुनियों ने उत्तर दिया, “हे राजन! हम ‘विश्वदेव’ हैं। आज से पांच दिन बाद माघ मास का स्नान शुरू होगा और आज ‘पुत्रदा एकादशी’ है। जो व्यक्ति आज के दिन व्रत करता है, उसे संतान की प्राप्ति होती है।”
यह सुनकर राजा की आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने हाथ जोड़कर कहा, “हे ऋषिवर! मेरे पास सबकुछ है, लेकिन कोई पुत्र नहीं है। यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो मुझे पुत्र प्राप्ति का वरदान दीजिए।”
मुनियों ने कहा, “राजन! आज पौष शुक्ल पक्ष की एकादशी है। तुम विधि-विधान से इस ‘पुत्रदा एकादशी’ का व्रत करो और रात्रि जागरण कर भगवान विष्णु का पूजन करो। भगवान की कृपा और व्रत के पुण्य से तुम्हारे घर में अवश्य ही पुत्र की किलकारी गूंजेगी।”
मुनियों के कहे अनुसार राजा ने उसी दिन पुत्रदा एकादशी का व्रत रखा। विधि-पूर्वक पूजा की और द्वादशी के दिन ब्राह्मणों को भोजन कराकर व्रत का पारण किया। इसके बाद राजा वापस अपनी नगरी लौट आए।
कुछ समय पश्चात रानी शैव्या ने गर्भ धारण किया और नौ माह पूर्ण होने पर एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया। वह राजकुमार बड़ा होकर अत्यंत वीर, धनवान और प्रजापालक राजा बना। राजा सुकेतुमान के पितरों को भी शांति मिली।
कथा का सार (माहात्म्य)
भगवान श्री कृष्ण कहते हैं: “हे युधिष्ठिर! संतान सुख की कामना रखने वालों को पौष पुत्रदा एकादशी का व्रत अवश्य करना चाहिए। जो मनुष्य इस कथा को पढ़ता या सुनता है, उसे इस लोक में संतान सुख मिलता है और मृत्यु के पश्चात वह स्वर्ग का अधिकारी बनता है।”
