
नई दिल्ली: राक्षस राज रावण शिव, तांडव स्तोत्रम रचयिता उनके नाम मात्र से ही पूरी पृथ्वी, तीनो लोक कापते थे। एक बार दैत्यराज रावण और ऋषि अगस्त्य के बीच में एक स्पर्धा हुई, ये तय हुआ की इस स्पर्धा में जो विजय होगा वो सर्वशक्तिमान कहलायेगा ,स्पर्धा की ये शर्त थी की एक पर्वत के सामने बैठकर जो भी उस पर्वत को अपनी विद्या से, अपनी सिद्धि से पिघला पायेगा वही विजेता साबित होगा। दोनों ने इस शर्त को मंजूर कर लिया ऋषि अगस्त्य और रावण दोनों को ये शर्त मंज़ूर थी सबसे पहले ऋषि अगस्त्य ने अपने हाथ में एक वीणा लेकर उसे बजाना शुरू कर दिया और देखते ही देखते संगीत से उनके सुर की वजह से थोड़े ही क्षणों के भीतर पूरा पहाड़ पिघलने लगा और ये देख कर रावण चौकन्ना हो गया फिर बारी आई रावण की।
जितने समाये के अन्दर ऋषि अगस्त्य ने पहाड़ पिघला दिया था उससे कम समाये में रावण को पिघलाना था जो बहुत मुश्किल था। रावण ने अपनी वीणा से भी बहुत कोशिश की अपनी विद्या से कोशिश की कि वो ये पहाड़ पिघल पाये लेकिन ये मुमकिन न बना ये देखकर रावण ने अपनी पराजय स्वीकार किया उन्होंने नत्मस्तक किया और ऋषि अगत्या से ये पूछा की आपके पास ऐसी कौनसी सिद्धि है जिसकी वजह से आप ये पहाड़ पिघल पाए, उन्होंने कहा मैंने जिस वीणा के संगीत से पहाड़ पिघलाया है उस वीणा के जो तार है वो याज़ी नामक प्राणी की नस से बने हुए है, याज़ी जो एक प्राणी था वो डायनासोर से भी पहले के समय में रह चुके थे मगर आज भी दक्षिण भारत के मंदिरो में जाओ तो वहां कलाकृतिया देखने को मिलती है। उसमे याज़ी के बहुत से शिल्प देखने को मिलेंगे इतना कहकर ऋषि अगस्त्य ने रावण को ये महाज्ञान दिया की कैसे याज़ी की नसों से वीणा के तार बनाये और बाद में रावण ने सुप्रसिद्ध, रुद्रवीणा का निर्माण किया।