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उत्तराखंड : संवेदनशील वसुंधरा हिम झील पर टला बड़ा खतरा, सर्वे के 11 महीने बाद भी अर्ली वार्निंग सिस्टम नदारद

देहरादून: उत्तराखंड में ग्लेशियरों पर बनी झीलें लगातार बड़े खतरे का सबब बनती जा रही हैं, लेकिन इन्हें लेकर सरकारी तंत्र की सुस्ती चिंता का विषय है। चमोली जिले में स्थित ‘ए’ श्रेणी की अति संवेदनशील वसुंधरा ताल (झील) के सर्वेक्षण के 11 महीने बीत जाने के बाद भी यहां अर्ली वार्निंग सिस्टम (पूर्व चेतावनी प्रणाली) नहीं लगाया जा सका है। यह स्थिति तब है जब वैज्ञानिक इस झील को आपदा की दृष्टि से बेहद खतरनाक मान चुके हैं।

राज्य में कुल 13 हिम झीलों को संवेदनशील के रूप में चिह्नित किया गया है, जिनमें से पांच को ‘ए’ श्रेणी यानी अत्यधिक संवेदनशील माना गया है।पिछले साल विशेषज्ञों के एक दल ने चमोली जिले के धौली गंगा बेसिन में स्थित वसुंधरा झील का सर्वेक्षण किया था। इस सर्वे का उद्देश्य झील की गहराई, पानी की मात्रा, और उसके फटने की स्थिति में होने वाले संभावित नुकसान का आकलन करना था, ताकि समय रहते सुरक्षा के उपाय किए जा सकें।

सर्वे के बाद सबसे महत्वपूर्ण कदम झील पर एक अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाना था। यह सिस्टम झील के जलस्तर में किसी भी असामान्य वृद्धि या किसी भी तरह की खतरनाक गतिविधि होने पर तुरंत अलर्ट जारी करता, जिससे निचले इलाकों में रहने वाले लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने के लिए बहुमूल्य समय मिल जाता। लेकिन, 11 महीने बीतने के बावजूद यह महत्वपूर्ण प्रणाली अब तक स्थापित नहीं हो पाई है, जिससे निचले इलाकों की सुरक्षा को लेकर एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है।

विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से इन झीलों का आकार लगातार बढ़ रहा है। ऐसी स्थिति में 2013 की केदारनाथ त्रासदी और 2021 में ऋषिगंगा में आई बाढ़ जैसी भयावह घटनाओं की पुनरावृत्ति की आशंका बनी रहती है। ये दोनों ही आपदाएं हिमनद झीलों के फटने (GLOF) के कारण हुई थीं।

राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (USDMA) के अधिकारियों के अनुसार, ग्लेशियर झीलों की निगरानी और एक फूलप्रूफ सिस्टम विकसित करने की दिशा में काम किया जा रहा है। वसुंधरा झील के सर्वे के बाद अब पिथौरागढ़ जिले में स्थित शेष चार ‘ए’ श्रेणी की झीलों का सर्वेक्षण 2025 में करने का लक्ष्य रखा गया है। सर्वेक्षण के बाद इन झीलों पर भी अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाने की योजना है।

हालांकि, जिस धीमी गति से काम हो रहा है, वह चिंताजनक है। आपदा की दृष्टि से बेहद संवेदनशील राज्य में इस तरह की देरी एक बड़े जोखिम को निमंत्रण देने जैसी है। स्थानीय निवासियों और पर्यावरणविदों ने मांग की है कि सरकार संवेदनशील झीलों की निगरानी और चेतावनी प्रणालियों की स्थापना के काम में तेजी लाए, ताकि भविष्य में किसी भी बड़ी आपदा से होने वाले जान-माल के नुकसान को कम किया जा सके।

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