
हम सभी जब भी शिवालय जाते हैं, तो देखते हैं कि नंदी महाराज सदैव शिवलिंग के ठीक सामने, एकटक महादेव को निहारते हुए विराजमान रहते हैं। महादेव के दर्शन से पहले नंदी के दर्शन की परंपरा है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि ऐसा क्यों है?
इसका उत्तर केवल उनके वाहन होने तक सीमित नहीं है। यह कहानी उस हठ, उस अनंत प्रतीक्षा और उस परम भक्ति की है, जिसने एक साधारण बालक को ‘नंदीश्वर’ बना दिया।
शिलाद ऋषि और अयोनिज पुत्र
यह कथा प्रारंभ होती है शिलाद ऋषि से। वे एक महान तपस्वी थे, किंतु निःसंतान थे। अपने वंश को आगे बढ़ाने की चिंता में उन्होंने भगवान शिव की घोर तपस्या की। जब महादेव प्रसन्न हुए, तो ऋषि ने उनसे एक ऐसे पुत्र का वरदान मांगा जो ‘अयोनिज’ हो—अर्थात जिसका जन्म मां के गर्भ से न हुआ हो और जिस पर स्वयं महादेव की कृपा हो।
शिव ने ‘तथास्तु’ कहा। कुछ समय बाद, जब शिलाद ऋषि यज्ञ के लिए भूमि जोत रहे थे, तो हल की नोक से धरती के भीतर एक बालक प्रकट हुआ। उस बालक के चेहरे पर सहस्त्र सूर्यों का तेज था। ऋषि ने प्रेमपूर्वक उसका नाम ‘नंदी’ रखा और उसका पालन-पोषण किया।
काल की भविष्यवाणी और नंदी का साहस
नंदी का बाल्यकाल आनंद में बीत रहा था, लेकिन नियति ने कुछ और ही लिखा था। एक दिन आश्रम में दो दिव्य ऋषि—मित्र और वरुण—पधारे। नंदी की सेवा-भावना से प्रसन्न होने के बावजूद, ऋषियों के चेहरे पर उदासी थी। उन्होंने शिलाद ऋषि को बताया, “यह बालक सर्वगुण संपन्न है, किंतु इसकी आयु बहुत कम है। इसकी मृत्यु निकट है।”
यह सुनकर पिता शिलाद शोक के सागर में डूब गए। परंतु, जब नंदी को यह सत्य ज्ञात हुआ, तो वे भयभीत होने के बजाय मुस्कुराए। उन्होंने अपने पिता से कहा, “पिताजी, आप व्यर्थ ही चिंता करते हैं। मेरा जन्म महादेव की कृपा से हुआ है, तो मेरी रक्षा का दायित्व भी उन्हीं का है।”
कठोर तप और महाकाल का आगमन
मृत्यु को चुनौती देने के लिए बालक नंदी ने भुवन नदी के तट पर कठोर तपस्या आरंभ की। यह तपस्या देवताओं के लिए भी दुर्लभ थी। उन्होंने अन्न-जल त्याग दिया और एक पैर पर खड़े होकर निरंतर शिव नाम का जाप करने लगे। उनकी भक्ति की अग्नि और तप के तेज से तीनों लोक कंपायमान हो उठे।
भक्त की ऐसी पुकार सुनकर महाकाल स्वयं को रोक न सके। भगवान शिव प्रकट हुए और बोले, “वत्स नंदी, नेत्र खोलो। मैं तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हूँ। वर मांगो।”
अमरत्व नहीं, सानिध्य का वरदान
सामने साक्षात शिव को देखकर नंदी विभोर हो गए। उन्होंने नंदी से जीवनदान या सांसारिक सुख नहीं मांगा। नंदी ने कहा, “हे प्रभु! मेरी बस एक ही इच्छा है। मैं एक क्षण भी आपके सानिध्य से दूर नहीं होना चाहता। मुझे बस अपने चरणों में स्थान दे दीजिए।”
बालक का ऐसा निस्वार्थ प्रेम और समर्पण देखकर महादेव द्रवित हो गए। उन्होंने नंदी को मृत्यु के भय से मुक्त कर ‘अमरत्व’ प्रदान किया। इतना ही नहीं, शिव ने उन्हें अपना सबसे प्रिय गण, अपना सखा और अपना वाहन स्वीकार किया।
महादेव ने वरदान दिया, “हे नंदीश्वर! आज से तुम मेरे द्वारपाल होगे। मेरे दर्शन से पहले संसार को तुम्हारे दर्शन करने होंगे। जो भक्त तुम्हारे कान में अपनी मनोकामना कहेगा, वह प्रार्थना सीधे मुझ तक पहुंचेगी। तुम मेरे और मेरे भक्तों के बीच की सबसे पवित्र कड़ी बनोगे।”
भक्ति का प्रतीक
यही कारण है कि आज भी नंदी शिवलिंग के सामने बैठे मिलते हैं। वे केवल एक बैल या वाहन नहीं हैं; वे धैर्य, प्रतीक्षा और समर्पण के प्रतीक हैं। नंदी हमें सिखाते हैं कि यदि भक्ति सच्ची हो और समर्पण पूर्ण हो, तो ईश्वर को भी भक्त के वश में होना पड़ता है।
