देहरादून: उत्तराखंड, जिसे देश का ‘लंग्स’ (फेफड़े) कहा जाता है और जहाँ लोग दिल्ली-एनसीआर के जानलेवा प्रदूषण से बचने के लिए शरण लेते हैं, अब खुद वायु प्रदूषण की गंभीर चपेट में है। पिछले एक सप्ताह में राज्य के प्रमुख शहरों की हवा में ‘जहर’ घुलने लगा है। बुधवार को देहरादून का AQI (Air Quality Index) 267 दर्ज किया गया, जो ‘खराब’ श्रेणी में आता है और स्वास्थ्य के लिए चिंताजनक है।
सिर्फ देहरादून ही नहीं, बल्कि ऋषिकेश और काशीपुर जैसे तराई व मैदानी शहरों में भी धुंध (Smog) की चादर देखी जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि हालात यही रहे, तो वह दिन दूर नहीं जब पहाड़ों की हवा भी महानगरों जैसी दमघोंटू हो जाएगी।
1. प्रकृति का बदलता मिजाज (Climate Change):
राज्य में पिछले 50 दिनों से बारिश न होने के कारण मौसम पूरी तरह शुष्क है। बारिश न होने से धूल के कण हवा में नीचे बैठने के बजाय वायुमंडल में ही ठहरे हुए हैं, जिससे ‘ड्राई कोल्ड’ और स्मॉग की स्थिति पैदा हो रही है।
2. विकास की भारी कीमत: पेड़ों का कटान और निर्माण:
सड़क चौड़ीकरण, ऑल वेदर रोड, रेलवे प्रोजेक्ट और हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स के लिए उत्तराखंड में बड़े पैमाने पर जंगलों को साफ किया गया है। निर्माण स्थलों से निकलने वाली धूल और पेड़ों की कमी ने हवा को फिल्टर करने की प्राकृतिक क्षमता को खत्म कर दिया है।
3. वाहनों का बढ़ता सैलाब:
राज्य गठन से लेकर अब तक उत्तराखंड में वाहनों की संख्या में जबरदस्त उछाल आया है। पिछले 25 वर्षों में 43 लाख से अधिक वाहन पंजीकृत हुए हैं। पहाड़ों की संकरी वादियों में इन वाहनों से निकलने वाला धुआं प्रदूषण का स्तर बढ़ा रहा है।
4. वनाग्नि और ब्लैक कार्बन:
हर साल गर्मियों और अब सर्दियों के सूखे मौसम में भी लगने वाली वनाग्नि से निकलने वाली राख और ‘ब्लैक कार्बन’ हवा को प्रदूषित कर रहे हैं। यह न केवल प्रदूषण बढ़ाता है बल्कि ग्लेशियरों के पिघलने की गति को भी तेज कर रहा है।
5. पर्यटन और चारधाम यात्रा का दबाव:
मसूरी, नैनीताल, ऋषिकेश और कैंची धाम जैसे स्थलों पर क्षमता से अधिक पर्यटकों का आगमन और उनके वाहनों का उत्सर्जन तापमान बढ़ा रहा है। चारधाम यात्रा के दौरान हजारों वाहनों का पहाड़ों के संवेदनशील इलाकों में पहुंचना हवा की गुणवत्ता को सीधे तौर पर प्रभावित कर रहा है।
6. अलाव और कूड़ा जलाना:
बढ़ती ठंड से बचने के लिए लकड़ी, कोयला और कचरा जलाने की घटनाओं में वृद्धि हुई है। सर्दियों की शांत हवा में यह धुआं ऊपर नहीं जा पाता और निचले वायुमंडल में फंसकर लोगों की सांसों में जहर घोल रहा है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि AQI का 200 के पार जाना बच्चों, बुजुर्गों और अस्थमा के रोगियों के लिए खतरनाक है। यदि समय रहते जंगलों के संरक्षण और निर्माण कार्यों में धूल नियंत्रण के कड़े नियम लागू नहीं किए गए, तो देवभूमि की ‘शुद्ध हवा’ वाली पहचान सिर्फ किताबों तक सीमित रह जाएगी।
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