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हरिद्वार: देवभूमि में संस्कृत के स्वर्णिम युग की शुरुआत, सीएम धामी का ऐतिहासिक निर्णय

उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने एक दूरदर्शी और ऐतिहासिक कदम उठाया है। हरिद्वार में आयोजित अंतरराष्ट्रीय संस्कृत सम्मेलन के समापन सत्र में सीएम धामी ने घोषणा की कि राज्य में संस्कृत भाषा के उत्थान और समग्र विकास के लिए एक उच्चस्तरीय आयोग (High-level Commission) का गठन किया जाएगा।

यह निर्णय न केवल देवभूमि की पहचान को सशक्त करेगा, बल्कि संस्कृत को आम जनमानस की भाषा बनाने में भी मील का पत्थर साबित होगा।

इस घोषणा की 5 बड़ी और सकारात्मक बातें:

  1. उच्चस्तरीय आयोग का गठन:
    राज्य के इतिहास में पहली बार संस्कृत के लिए एक समर्पित आयोग बनेगा।[5] यह आयोग केवल कागजी नहीं होगा, बल्कि इसका मुख्य कार्य संस्कृत शिक्षा, शोध (Research) और रोजगार के नए अवसरों को तलाशना होगा।
  2. ‘आदर्श संस्कृत ग्राम’ का सपना होगा सच:
    सीएम धामी ने संकल्प दोहराया है कि राज्य के हर जिले में एक ‘आदर्श संस्कृत ग्राम’ (Model Sanskrit Village) विकसित किया जाएगा। इन गांवों में लोग रोजमर्रा की बातचीत में भी संस्कृत का प्रयोग करेंगे, जिससे यह भाषा केवल किताबों तक सीमित न रहकर “लोकभाषा” बनेगी।
  3. रोजगार से जुड़ेगी देववाणी:
    सरकार का विजन स्पष्ट है – संस्कृत को केवल पूजा-पाठ की भाषा नहीं, बल्कि रोजगार की भाषा बनाना है। नई शिक्षा नीति (NEP) के तहत संस्कृत छात्रों के लिए स्कॉलरशिप और शोध के लिए आर्थिक सहायता बढ़ाने की भी योजना है।
  4. विज्ञान और तकनीक का संगम:
    सीएम धामी ने कहा कि प्राचीन ज्ञान-विज्ञान (जैसे आयुर्वेद, योग, खगोल शास्त्र) की जड़ें संस्कृत में हैं। यह आयोग इस प्राचीन ज्ञान को आधुनिक विज्ञान के साथ जोड़कर दुनिया के सामने लाने का काम करेगा।
  5. वैश्विक पहचान:
    हरिद्वार में हुए इस सम्मेलन में देश-विदेश के विद्वानों ने भाग लिया। सीएम ने साफ किया कि जैसे तक्षशिला और नालंदा ने दुनिया को ज्ञान दिया, वैसे ही उत्तराखंड अब संस्कृत के माध्यम से भारत की “विश्व गुरु” वाली छवि को पुनर्जीवित करेगा।

सीएम धामी का विजन:

मुख्यमंत्री ने भावुक होते हुए कहा, “संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति की आत्मा है। यह हमारे लिए गौरव की बात है कि उत्तराखंड की द्वितीय राजभाषा संस्कृत है। हम इसे जन-जन की भाषा बनाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।”

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