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संकट में पहाड़: उत्तराखंड में कम बारिश-बर्फबारी ने बढ़ाई चिंता

देहरादून। उत्तराखंड में इस साल शीतकाल के दौरान कम बर्फबारी और बारिश ने राज्य की आर्थिकी को गहरा झटका दिया है। पहाड़ों में न केवल पर्यटन कारोबार सुस्त पड़ा है, बल्कि कृषि और बागवानी पर भी प्रकृति की दोहरी मार पड़ी है। स्थिति कितनी गंभीर है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 12,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित विश्व प्रसिद्ध तुंगनाथ धाम में, जहाँ दिसंबर में बर्फ की मोटी चादर बिछ जाती थी, वहां जनवरी के मध्य तक जमीन सूखी पड़ी है। विशेषज्ञों के अनुसार, 1985 के बाद पहली बार ऐसे हालात देखे जा रहे हैं।

90% असिंचित खेती बारिश पर निर्भर, गेहूं की फसल को भारी नुकसान

प्रदेश के पर्वतीय जिलों में कृषि की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। उत्तराखंड में लगभग 90 प्रतिशत कृषि भूमि असिंचित है, जो पूरी तरह से बारिश पर निर्भर है। अक्टूबर-नवंबर में बोई गई गेहूं की फसल अब सूखने की कगार पर है।

कृषि विभाग की रिपोर्ट के अनुसार:

  • उत्तरकाशी: भटवाड़ी और डुंडा ब्लॉक में 25% फसल खराब हो चुकी है। पुरोला, नौगांव और मोरी में भी 10 से 20% नुकसान है।
  • देहरादून: चकराता और कालसी क्षेत्र में गेहूं और मटर की फसल को 15 से 20% तक क्षति हुई है।
  • अन्य जिले: चमोली, टिहरी, नैनीताल, अल्मोड़ा और पिथौरागढ़ सहित लगभग सभी 10 जिलों से फसलों के नुकसान की रिपोर्ट प्राप्त हुई है।

कृषि निदेशक दिनेश कुमार का कहना है कि बारिश न होने से पौधों की पत्तियां पीली पड़ने लगी हैं और पैदावार में भारी गिरावट की आशंका है।

दुर्लभ जड़ी-बूटियों पर अस्तित्व का संकट

उच्च हिमालयी क्षेत्रों में बर्फबारी न होने से दुर्लभ औषधीय वनस्पतियों के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है। गढ़वाल विश्वविद्यालय के एल्पाइन शोध केंद्र (तुंगनाथ) के विशेषज्ञों के मुताबिक, अतीस, कुटकी, जटामांसी और वन तुलसी जैसी जड़ी-बूटियों को अंकुरण के लिए बर्फ से मिलने वाली नमी और विशिष्ट तापमान की आवश्यकता होती है।

जड़ी-बूटी विशेषज्ञ डॉ. विजयकांत पुरोहित ने बताया कि बर्फ का अभाव इन पौधों के प्राकृतिक जीवन चक्र को बाधित कर रहा है, जिससे भविष्य में इनके उत्पादन और औषधीय गुणों में कमी आ सकती है।

जंगलों में बढ़ी आग की घटनाएं

बारिश न होने के कारण जंगलों में नमी खत्म हो गई है, जिससे वनाग्नि की घटनाएं समय से पहले बढ़ने लगी हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, नवंबर 2025 से अब तक प्रदेश में 31 वनाग्नि की घटनाएं दर्ज की जा चुकी हैं, जिनमें 15 हेक्टेयर वन क्षेत्र को नुकसान पहुँचा है। मुख्य वन संरक्षक सुशांत पटनायक ने बताया कि विभाग अलर्ट पर है और आग पर नियंत्रण के प्रयास किए जा रहे हैं।

सेब की बागवानी पर भी संकट

पंतनगर विश्वविद्यालय के वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक डॉ. अजीत सिंह नैन के अनुसार, सेब की फसल के लिए 1000 से 1500 घंटों की ‘चिलिंग रिक्वायरमेंट’ (ठंडक) अनिवार्य होती है। पर्याप्त बर्फबारी और बारिश न होने से सेब की गुणवत्ता और पैदावार दोनों प्रभावित होंगे।

मौसम विभाग की भविष्यवाणी: जनवरी के दूसरे सप्ताह से उम्मीद

मौसम विज्ञान केंद्र देहरादून के निदेशक डॉ. सी.एस. तोमर ने बताया कि पिछले पांच वर्षों के आंकड़ों को देखें तो केवल 2024 में ही दिसंबर में सामान्य बारिश हुई थी। वर्तमान में पश्चिमी विक्षोभ सक्रिय हो रहा है, जिससे जनवरी के दूसरे सप्ताह के बाद बारिश और बर्फबारी की संभावना है। यदि जल्द बारिश होती है, तो यह फसलों और पर्यावरण के लिए संजीवनी साबित होगी।

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