
देहरादून: उत्तराखंड में ऑल वेदर रोड और गंगोत्री हाईवे चौड़ीकरण परियोजना एक बार फिर विवादों में घिर गई है। इस बार विरोध की आवाज किसी विपक्षी दल ने नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के अनुषांगिक संगठन ‘स्वदेशी जागरण मंच’ और पर्यावरणविदों ने उठाई है।
मंच ने सरकार को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा है कि विकास के नाम पर हिमालय का विनाश बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
7 हजार देवदार के पेड़ों पर संकट
स्वदेशी जागरण मंच (SJM) और स्थानीय पर्यावरणविदों की एक रिपोर्ट ने सबको चौंका दिया है। दावे के मुताबिक, गंगोत्री राष्ट्रीय राजमार्ग के चौड़ीकरण के लिए गंगोत्री धाम के मुख्य द्वार यानी सुक्की टॉप से लेकर गंगोत्री तक करीब 7,000 दुर्लभ देवदार (Deodar) के पेड़ काटे जाने की योजना है।
पर्यावरणविदों का कहना है कि एक देवदार के पेड़ को पूरी तरह विकसित होने में 100 साल से अधिक का समय लगता है। इन प्राचीन वनों को काटना हिमालय की हत्या करने जैसा है।
“मां गंगा सूख जाएगी”
इस परियोजना के विरोध में सबसे बड़ी चिंता ‘मां गंगा’ के अस्तित्व को लेकर जताई गई है। विरोध कर रहे लोगों का तर्क है:
- जल स्रोत सूखेंगे: देवदार के जंगल बादलों को रोकते हैं और जमीन में पानी को सोखकर जल स्रोतों (Springs) को जीवित रखते हैं। अगर ये पेड़ कटे, तो भागीरथी घाटी के प्राकृतिक जल स्रोत सूख जाएंगे, जिसका सीधा असर गंगा के जलस्तर पर पड़ेगा।
- ग्लेशियर पर खतरा: पेड़ों के कटने से तापमान बढ़ेगा, जिससे गंगोत्री ग्लेशियर के पिघलने की रफ़्तार तेज हो जाएगी और अंततः गंगा नदी सूखने की कगार पर आ सकती है।
“भविष्य में नहीं होगी बर्फबारी”
स्थानीय लोगों और पर्यावरणविदों ने चेतावनी दी है कि हर्षिल और गंगोत्री घाटी अपनी भारी बर्फबारी और सेब के बागानों के लिए प्रसिद्ध है। अगर इतनी बड़ी तादाद में पेड़ काटे गए, तो यहाँ का माइक्रो-क्लाइमेट (Micro-climate) बदल जाएगा।
परिणामस्वरूप, आने वाले सालों में यहाँ बर्फबारी (Snowfall) पूरी तरह बंद हो सकती है, जिससे न केवल पर्यटन खत्म होगा बल्कि स्थानीय कृषि और सेब उत्पादन भी बर्बाद हो जाएगा।
स्वदेशी जागरण मंच की मांग
RSS से जुड़े संगठन स्वदेशी जागरण मंच ने केंद्र और राज्य सरकार से अपील की है कि वे इस परियोजना पर पुनर्विचार करें। उनकी मांग है कि:
- पुराने और संकरे रास्तों का ही सुदृढ़ीकरण किया जाए, चौड़ीकरण के लिए पेड़ न काटे जाएं।
- हिमालय की संवेदनशीलता को देखते हुए ‘इको-फ्रेंडली’ विकास मॉडल अपनाया जाए।
फिलहाल, इस विरोध ने सरकार की चिंता बढ़ा दी है, क्योंकि अपने ही वैचारिक संगठन द्वारा उठाए गए सवालों को नजरअंदाज करना प्रशासन के लिए आसान नहीं होगा।
