UTTARAKHAND

उत्तराखंड के छह साहित्यकारों को मिला दीर्घकालीन साहित्य सेवी सम्मान, मुख्यमंत्री धामी ने किया सम्मानित

देहरादून: हिंदी दिवस के अवसर पर उत्तराखंड के छह प्रतिष्ठित साहित्यकारों को “उत्तराखंड दीर्घकालीन साहित्य सेवी सम्मान” से सम्मानित किया गया। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने देहरादून में आयोजित एक समारोह में यह सम्मान प्रदान किया। इस पुरस्कार के तहत प्रत्येक साहित्यकार को पांच लाख रुपये की सम्मान राशि प्रदान की गई। सम्मानित होने वालों में दिवंगत शैलेश मटियानी, गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’, शेरदा अनपढ़ और हीरा सिंह राणा को मरणोपरांत यह सम्मान दिया गया, जबकि सोमवारी लाल उनियाल और अतुल शर्मा को भी उनके साहित्यिक योगदान के लिए सम्मानित किया गया।

इस अवसर पर मुख्यमंत्री धामी ने राज्य में साहित्यिक पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए दो ‘साहित्य ग्राम’ स्थापित करने की भी घोषणा की। उन्होंने कहा कि सरकार उत्तराखंड भाषा संस्थान के माध्यम से राज्य के बिखरे हुए साहित्य को संरक्षित, संकलित और पुनर्स्थापित करने के लिए ठोस कदम उठा रही है।

साहित्य के दिग्गजों का सम्मान

यह सम्मान पाने वाले सभी साहित्यकारों ने उत्तराखंड और हिंदी साहित्य में अविस्मरणीय योगदान दिया है:

  • शैलेश मटियानी (मरणोपरांत): आधुनिक हिंदी साहित्य में ‘नई कहानी’ आंदोलन के एक प्रमुख कहानीकार और गद्यकार थे। उनके उपन्यास ‘बोरीवली से बोरीबंदर तक’ और ‘मुठभेड़’ तथा ‘चील’ और ‘अर्धांगिनी’ जैसी कहानियों ने उन्हें एक अलग पहचान दिलाई। मटियानी अपनी निडर और यथार्थवादी लेखन शैली के लिए जाने जाते थे, जो समाज के शोषित और वंचित वर्ग की आवाज को बुलंद करती थी।
  • गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’ (मरणोपरांत): एक बहुआयामी प्रतिभा के धनी थे, जो एक पटकथा लेखक, निर्देशक, गीतकार, गायक, कवि और सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में जाने जाते हैं। उत्तराखंड आंदोलन के दौरान उनके लिखे और गाए गीतों ने जन-जन में जोश भर दिया था। “हम लड़ते रयां भुला, हम लड़ते रुलों” और “उत्तराखंड मेरी मातृभूमि” जैसे उनके गीत आज भी लोगों की जुबान पर हैं।
  • शेरदा अनपढ़ (शेर सिंह बिष्ट) (मरणोपरांत): कुमाऊंनी कविता के एक महत्वपूर्ण स्तंभ थे, जिन्होंने इस बोली को एक नई पहचान दिलाई। औपचारिक शिक्षा न होने के बावजूद, उनकी कविताओं में पहाड़ के जीवन, वहां के दर्द और लोक संस्कृति का सजीव चित्रण मिलता है। ‘ये कहानी है नेफा और लद्दाख की’, ‘दीदी-बैणी’, और ‘मेरी लाटी-पाटी’ उनकी कुछ प्रमुख रचनाएं हैं।
  • हीरा सिंह राणा (मरणोपरांत): कुमाऊंनी के एक लोकप्रिय लोक गायक, कवि और संगीतकार थे। उनके गीतों में पहाड़ की पीड़ा, प्रकृति का सौंदर्य और पलायन जैसे सामाजिक मुद्दों की गहरी अभिव्यक्ति मिलती है। उत्तराखंड आंदोलन के दौरान उनके गीत ‘लस्का कमर बांधा’ ने आंदोलनकारियों में एक नया उत्साह भर दिया था।
  • सोमवारी लाल उनियाल: एक वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार हैं। उनकी हाल ही में प्रकाशित पुस्तक ‘बचे हैं शब्द अभी’ की काफी सराहना हुई है। उनियाल जी अपने लेखन में ग्रामीण जीवन और सामाजिक सरोकारों को प्रमुखता देते हैं।
  • अतुल शर्मा: एक विपुल लेखक हैं, जिन्होंने अब तक 40 पुस्तकें लिखी हैं। वे एक साहित्यिक परिवार से आते हैं और उनके पिता राम शर्मा एक स्वतंत्रता सेनानी और कवि थे। शर्मा को ‘जनकवि’ के रूप में भी जाना जाता है और उनके घर का साहित्यिक माहौल, जहाँ हरिवंश राय बच्चन जैसे दिग्गजों का आना-जाना था, उनके लेखन में झलकता है।

मुख्यमंत्री धामी ने कहा कि इन साहित्यकारों ने अपनी रचनात्मकता से समाज को नई दिशा दी है और उनकी साहित्यिक विरासत को संरक्षित करना हम सभी का नैतिक दायित्व है।

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