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उत्तराखंड में खेती की नई क्रांति: जलवायु परिवर्तन के बीच ‘सुपरफूड’ किनोवा की खेती शुरू करेगा ग्राम्य विकास विभाग

देहरादून: उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में खेती को लाभकारी बनाने और पलायन की समस्या से निपटने के लिए राज्य सरकार ने एक साहसिक कदम उठाया है। ग्राम्य विकास विभाग ने राज्य में पहली बार ‘किनोवा’ (Quinoa) की खेती का पायलट प्रोजेक्ट शुरू करने का निर्णय लिया है। कम पानी और कम मेहनत में अधिक मुनाफा देने वाली यह फसल उत्तराखंड के किसानों के लिए भविष्य का ‘गोल्ड माइन’ साबित हो सकती है।

थलीसैंण से होगी शुरुआत, 100 एकड़ भूमि का चयन

ग्राम्य विकास विभाग के सचिव धीरज गर्ब्याल के अनुसार, इस पायलट प्रोजेक्ट के लिए पौड़ी गढ़वाल जिले के थलीसैंण क्षेत्र को चुना गया है। विभाग ने इस प्रोजेक्ट के तहत करीब 100 एकड़ भूमि पर किनोवा की खेती करने की योजना बनाई है। इसके लिए प्रमाणित बीज बाहर से मंगाए गए हैं। यदि यह प्रयोग सफल रहता है, तो विभाग राज्य में ही किनोवा का अपना ‘सीड बैंक’ विकसित करेगा ताकि स्थानीय किसानों को गुणवत्तापूर्ण बीज आसानी से मिल सकें।

क्यों है किनोवा किसानों के लिए वरदान?

किनोवा को दुनिया भर में ‘सुपरफूड’ माना जाता है। इसकी खेती उत्तराखंड के लिए कई मायनों में गेम-चेंजर हो सकती है:

  • कम पानी में अधिक पैदावार: किनोवा को अत्यधिक सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती, जो जल संकट से जूझ रहे पहाड़ी क्षेत्रों के लिए आदर्श है।
  • साल में कई फसलें: पारंपरिक मंडुवा की तरह यह फसल भी पहाड़ी जलवायु के अनुकूल है, लेकिन अच्छी बात यह है कि अनुकूल क्षेत्रों में इसे साल में 2 से 3 बार उगाया जा सकता है।
  • रोग-प्रतिरोधी: इसमें कीटों और रोगों का प्रकोप अन्य फसलों की तुलना में कम होता है, जिससे किसानों की लागत घटती है।
  • उच्च पोषण मूल्य: किनोवा में 14-16% प्रोटीन के साथ सभी आवश्यक अमीनो एसिड, फाइबर, आयरन और कैल्शियम भरपूर मात्रा में होते हैं। यह ग्लूटेन-फ्री होने के कारण बाजार में अत्यधिक मांग में है।

बाजार में है भारी मांग, दोगुनी कमाई का मौका

वर्तमान में भारत में किनोवा की थोक कीमत 80 से 150 रुपये प्रति किलोग्राम है, जबकि प्रीमियम और ऑर्गेनिक किनोवा 200 से 300 रुपये प्रति किलोग्राम तक बिकता है। प्रगतिशील किसान सुधीर सुंदरियाल ने सरकार के इस कदम का स्वागत करते हुए कहा कि यदि किसानों को सही प्रशिक्षण और बाजार उपलब्ध कराया जाए, तो किनोवा पहाड़ों में खेती की तस्वीर बदल सकता है और युवाओं को कृषि की ओर आकर्षित कर सकता है।

कृषि विविधीकरण की दिशा में बड़ा कदम

उत्तराखंड का ग्राम्य विकास विभाग पहले से ही विभिन्न मिलेट्स (मोटे अनाज) के लिए सीड बैंक पर काम कर रहा है। अब किनोवा को इसमें शामिल करने से राज्य में कृषि विविधीकरण (Agricultural Diversification) को मजबूती मिलेगी। यह पहल न केवल किसानों की आय बढ़ाएगी, बल्कि जलवायु परिवर्तन के दौर में पहाड़ों में खेती को अधिक टिकाऊ और भरोसेमंद बनाएगी।

थलीसैंण का यह पायलट प्रोजेक्ट अब उत्तराखंड के कृषि भविष्य की आधारशिला बनने जा रहा है। यदि यह सफल हुआ, तो जल्द ही पूरे प्रदेश के पहाड़ी जिलों में किनोवा की सुनहरी फसलें लहलहाती दिखाई देंगी।

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