
ओडिशा के पुरी में स्थित जगन्नाथ मंदिर अपनी भव्यता के साथ-साथ एक कठोर नियम के लिए भी जाना जाता है। यहाँ अविवाहित प्रेमी जोड़ों का एक साथ प्रवेश वर्जित है। इसके पीछे एक पुरानी और दर्द भरी दास्तान है।
कहा जाता है कि एक बार राधारानी, अपने प्रिय कन्हैया के ‘जगन्नाथ’ रूप के दर्शन करने पुरी के सिंहद्वार पर पहुंचीं। मन में मिलन की आस थी, लेकिन पुजारियों ने उन्हें द्वार पर ही रोक दिया। उन्होंने धर्म और मर्यादा का हवाला देते हुए कहा, “हे देवी! मंदिर के भीतर प्रभु अपनी पत्नियों के साथ विराजमान हैं। चूंकि आप श्रीकृष्ण की विवाहित पत्नी नहीं, केवल उनकी प्रेमिका हैं, इसलिए आपको भीतर जाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।”
अपने निश्छल प्रेम का यह अपमान राधारानी सह न सकीं। आहत होकर उन्होंने उसी क्षण एक श्राप दे दिया:
“जिस मर्यादा की दुहाई देकर आज मुझे मेरे आराध्य से मिलने से रोका गया है, वह गवाह रहे— आज के बाद यदि कोई भी अविवाहित प्रेमी जोड़ा इस मंदिर में एक साथ प्रवेश करेगा, तो उनका प्रेम कभी सफल नहीं होगा। वे भी मेरी तरह विरह में तड़पेंगे और उनका रिश्ता टूट जाएगा।”
बस तभी से यह परंपरा पत्थर की लकीर बन गई। राधारानी के श्राप का भय आज भी इतना गहरा है कि जिन जोड़ों की सगाई हो चुकी है, वे भी विवाह संपन्न होने तक एक साथ मंदिर में प्रवेश नहीं करते, ताकि उनका रिश्ता कहीं टूट न जाए। यह नियम आज भी मंदिर की मर्यादा और उस पौराणिक विरह की याद दिलाता है।
