कुरुक्षेत्र (हरियाणा): कुरुक्षेत्र की मिट्टी आज भी उन पदचापों की गवाह है, जिन्होंने हस्तिनापुर के सिंहासन के लिए अपनी आहुति दे दी थी। भगवान श्री कृष्ण ने इस स्थान को चुनने के पीछे बहुत गहरी रणनीति अपनाई थी।

महाभारत का युद्ध कोई साधारण युद्ध नहीं था, यह ‘धर्मयुद्ध’ था। पौराणिक कथाओं और शास्त्रों के अनुसार, इस महाविनाशकारी युद्ध के लिए कुरुक्षेत्र की भूमि को चुनने के पीछे कुछ बेहद खास और रहस्यमयी कारण थे।
यहाँ वह कहानी दी गई है कि आखिर कुरुक्षेत्र ही इस महान संग्राम का साक्षी क्यों बना:
1. श्री कृष्ण की चिंता और दूतों की परीक्षा
जब यह निश्चित हो गया कि पांडवों और कौरवों के बीच युद्ध होकर रहेगा, तब भगवान श्री कृष्ण युद्ध के लिए एक ऐसी भूमि की तलाश में थे, जहाँ पहुँचने के बाद योद्धाओं के मन में अपनों के प्रति मोह या दया का भाव जागृत न हो। श्री कृष्ण जानते थे कि यह भाइयों, गुरुओं और शिष्यों के बीच का युद्ध है। उन्हें डर था कि कहीं रणभूमि में अपनों को सामने देखकर पांडव या अन्य योद्धा संधि न कर लें या युद्ध से पीछे न हट जाएं।
भगवान श्री कृष्ण ने कई दूतों को अलग-अलग दिशाओं में भेजा कि वे वहां की घटनाओं का निरीक्षण करें और उन्हें आकर बताएं।
2. भाई द्वारा भाई की हत्या: वह हृदयविदारक घटना
एक दूत जब कुरुक्षेत्र की ओर से गुजर रहा था, तो उसने एक अजीब घटना देखी। वहाँ खेत की मेड़ टूट गई थी और बारिश का पानी बाहर निकल रहा था। एक बड़ा भाई अपने छोटे भाई से कह रहा था कि वह उस मेड़ को ठीक करे। जब छोटा भाई नहीं मान पाया, तो बड़े भाई ने गुस्से में आकर अपने ही भाई की हत्या कर दी और उसकी लाश को मेड़ की जगह दबा दिया ताकि पानी रुक जाए।
जब दूत ने श्री कृष्ण को यह बात बताई, तो श्री कृष्ण समझ गए कि इस भूमि के संस्कार ऐसे हैं जहाँ अपने भाई के प्रति भी मोह पैदा नहीं होता। उन्होंने तय किया कि यही वह भूमि है जहाँ धर्म के लिए अपनों पर प्रहार करने में योद्धा हिचकेंगे नहीं।
3. राजा कुरु का तप और इंद्र का वरदान
कुरुक्षेत्र का नाम राजा कुरु के नाम पर पड़ा है। राजा कुरु ने इस भूमि को अपने हाथों से जोता था और यहाँ कड़ी तपस्या की थी। जब देवराज इंद्र ने उनसे पूछा कि वे ऐसा क्यों कर रहे हैं, तो राजा कुरु ने कहा, “मैं चाहता हूँ कि इस भूमि पर जो भी व्यक्ति धर्म के लिए लड़ते हुए मृत्यु को प्राप्त हो, उसे स्वर्ग मिले और उसके पाप कट जाएं।”
इंद्र ने अंततः उन्हें वरदान दिया कि “यह भूमि धर्मक्षेत्र कहलाएगी और यहाँ युद्ध में मरने वाला वीर सीधे स्वर्ग का अधिकारी होगा।”
श्री कृष्ण चाहते थे कि महाभारत के युद्ध में जो लाखों योद्धा मारे जाने वाले हैं, उन्हें इस पवित्र भूमि के प्रभाव से सद्गति प्राप्त हो।
4. ‘धर्मक्षेत्र’ और कुरुक्षेत्र का भूगोल
कुरुक्षेत्र को ‘सरस्वती और दृषद्वती’ नदियों के बीच स्थित माना जाता था, जिसे ब्रह्मावर्त का केंद्र कहा गया है। यह स्थान आध्यात्मिक ऊर्जा से भरपूर था। श्री कृष्ण चाहते थे कि अधर्म का नाश ऐसी जगह हो जो ऋषियों की तपस्थली रही हो, ताकि आने वाली पीढ़ियां इसे धर्म की विजय के रूप में याद रखें।
इसीलिए, जब गीता का पहला श्लोक शुरू होता है, तो धृतराष्ट्र संजय से पूछते हैं:
“धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः…”
(अर्थात्: धर्म की भूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से एकत्र हुए मेरे और पांडु के पुत्रों ने क्या किया?)
निष्कर्ष:
भगवान श्री कृष्ण ने कुरुक्षेत्र को इसलिए चुना ताकि युद्ध के दौरान योद्धाओं का ‘मोह’ उनके ‘कर्तव्य’ के आड़े न आए और इस भीषण रक्तपात के बाद भी मरने वाले योद्धाओं को राजा कुरु के पुण्य के कारण उत्तम लोक की प्राप्ति हो सके।
