
महमूद गजनवी का नाम तो सबने सुना है… सोमनाथ मंदिर तोड़ने वाला… भारत को लूटने वाला। लेकिन क्या आपने उस योद्धा का नाम सुना है जिसने गजनवी की सेना को ऐसी धूल चटाई कि अगले 150 सालों तक किसी हमलावर की हिम्मत नहीं हुई भारत की तरफ देखने की?
ये कहानी है इतिहास के पन्नों से गायब कर दिए गए एक महानायक की… एक ऐसे राजा की, जिसकी जीत इतनी बड़ी थी कि उसे जानबूझकर छुपाया गया।
आज हम खोलेंगे वो राज़ जो आपको स्कूल की किताबों में कभी नहीं पढ़ाया गया… कहानी, महाराजा सुहेलदेव की!”
यह कहानी है 11वीं सदी के श्रावस्ती के महाराजा सुहेलदेव की, जिन्होंने विदेशी आक्रमणकारी महमूद गजनवी के भांजे सैयद सालार मसूद गाजी को एक ऐसी हार दी, जिसके बाद लगभग 150 वर्षों तक किसी आक्रांता ने भारत की ओर आंख उठाकर देखने की हिम्मत नहीं की।
11वीं सदी की शुरुआत में महमूद गजनवी भारत पर लगातार हमले कर रहा था। उसका मकसद भारत के धन को लूटना और मंदिरों को तोड़ना था। सोमनाथ मंदिर को लूटने और तोड़ने के बाद, गजनवी की सेना का आत्मविश्वास सातवें आसमान पर था। गजनवी के बाद, उसके भांजे सैयद सालार मसूद गाजी ने भारत पर स्थायी इस्लामी शासन स्थापित करने का सपना देखा।
महज 16 साल की उम्र में, सालार मसूद एक विशाल सेना लेकर सिंधु नदी पार कर भारत में घुसा। उसने मुल्तान, दिल्ली और मेरठ जैसे कई राज्यों को जीत लिया और अवध की ओर बढ़ने लगा। उसका आतंक ऐसा था कि रास्ते में पड़ने वाले राज्य या तो हार मान लेते या नष्ट कर दिए जाते। उसने अपना मुख्यालय बाराबंकी के पास सतरिख में बनाया और वहां से आसपास के राज्यों को जीतने के लिए अपनी सेनाएं भेजने लगा।
जब सालार मसूद की सेना बहराइच की ओर बढ़ी, तो उसका सामना श्रावस्ती के प्रतापी राजा सुहेलदेव से हुआ। महाराजा सुहेलदेव एक दूरदर्शी और वीर शासक थे, जिन्होंने विदेशी आक्रांताओं के खतरे को पहचान लिया था। उन्होंने यह समझ लिया था कि अकेले इस विशाल सेना का सामना करना मुश्किल होगा।
इसलिए, उन्होंने एक ऐतिहासिक कदम उठाया। उन्होंने उस समय के छोटे-बड़े 21 राजाओं को एकजुट किया। इन राजाओं में लखीमपुर, सीतापुर, लखनऊ और बाराबंकी जैसे क्षेत्रों के शासक शामिल थे, जिन्होंने अपनी आपसी दुश्मनी भुलाकर देश की रक्षा के लिए एक गठबंधन बनाया। यह उस दौर में भारतीय एकता का एक अद्भुत उदाहरण था, जहां जाति और क्षेत्र से ऊपर उठकर सभी ने एक साथ लड़ने का फैसला किया।
जून 1033 में, बहराइच के पास चित्तौरा झील के किनारे इतिहास का एक निर्णायक युद्ध लड़ा गया। सालार मसूद की सेना संख्या में बहुत बड़ी थी और उसे अपनी जीत का पूरा भरोसा था। उसने अपनी सेना को कई टुकड़ियों में बांटकर आक्रमण करने की योजना बनाई।
लेकिन राजा सुहेलदेव एक कुशल रणनीतिकार थे। उन्होंने अपनी सेना को इस तरह से संगठित किया कि दुश्मन के हर हमले का मुंहतोड़ जवाब दिया जा सके। युद्ध कई दिनों तक चला। सुहेलदेव की सेना ने ऐसी वीरता दिखाई कि मसूद की विशाल सेना घास की तरह कटने लगी। सुहेलदेव ने खुद युद्ध का नेतृत्व किया और अपने अदम्य साहस से सैनिकों में जोश भर दिया।
आखिरकार, वह निर्णायक दिन आया जब राजा सुहेलदेव का सीधा मुकाबला सालार मसूद से हुआ। राजा सुहेलदेव ने अपने तीर से सालार मसूद को घायल कर दिया और उसे मौत के घाट उतार दिया। सेनापति के मरते ही गजनवी की सेना में भगदड़ मच गई। सुहेलदेव की सेना ने दुश्मनों को पूरी तरह से खत्म कर दिया और एक भी सैनिक को जीवित नहीं बचने दिया।
बहराइच की यह जीत कोई साधारण जीत नहीं थी। यह उस विदेशी ताकत पर एक करारी चोट थी जो पूरे भारत को रौंदना चाहती थी। इस युद्ध का असर इतना गहरा हुआ कि अगले लगभग 150 वर्षों तक तुर्क आक्रमणकारियों ने अवध और उसके आसपास के क्षेत्रों की ओर देखने की हिम्मत नहीं की।
हालांकि, बाद के इतिहासकारों ने, विशेषकर दरबारी लेखकों ने, इस शर्मनाक हार का उल्लेख बहुत कम किया या फिर इसे तोड़-मरोड़ कर पेश किया। यही कारण है कि राजा सुहेलदेव जैसे महानायक को इतिहास की किताबों में वह स्थान नहीं मिला, जिसके वे हकदार थे। लेकिन लोककथाओं और स्थानीय गीतों में उनकी वीरता की कहानी हमेशा जीवित रही।
आज, महाराजा सुहेलदेव को एक ऐसे नायक के रूप में याद किया जाता है जिन्होंने विदेशी आक्रमणकारियों के खिलाफ भारत की एकता और शौर्य का प्रदर्शन किया था। वे भारतीय राष्ट्रवाद और साहस के प्रतीक हैं। उनकी कहानी हमें यह सिखाती है कि जब भी भारतीय एकजुट होकर खड़े हुए हैं, उन्होंने बड़ी से बड़ी चुनौती का सामना किया है और विजय प्राप्त की है।
