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हिमालय की झीलों से उभरता संकट: भूकंप से तीन करोड़ जनता पर मंडराता खतरा”

 देहरादून:हिमालय क्षेत्र में स्थित 188 ग्लेशियर झीलें एक बड़े खतरे का संकेत दे रही हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, इन झीलों के भूकंप के दौरान फटने की संभावना है, जिससे कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम, और अरुणाचल प्रदेश जैसे 6 राज्यों में लगभग तीन करोड़ लोगों की आबादी पर गंभीर संकट मंडरा रहा है।

ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव से ये झीलें लगातार पिघल रही हैं और उनका आकार बढ़ रहा है, जिससे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) की घटनाओं का खतरा बढ़ गया है। इस तरह की आपदा से निचले क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर पानी और मलबे का बहाव हो सकता है, जिससे जन-धन की हानि हो सकती है।

इस समस्या का समाधान और निवारण के लिए तत्काल और दीर्घकालिक उपायों की आवश्यकता है। सरकार और संबंधित एजेंसियों को इस दिशा में कार्य करने की जरूरत है ताकि इस तरह की प्राकृतिक आपदाओं का सामना किया जा सके और जनता की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

ग्लोबल वॉर्मिंग से हिमालय की ग्लेशियर झीलों पर खतरा बढ़ रहा है। बढ़ती गर्मी के कारण ये झीलें साल दर साल पिघल रही हैं। कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश की 28,043 ग्लेशियर झीलों में से 188 झीलें कभी भी तबाही का बड़ा कारण बन सकती हैं। इससे लगभग तीन करोड़ की आबादी पर बड़ा संकट मंडरा रहा है।

एक वर्ष के गहन अध्ययन के बाद, केंद्रीय गृह मंत्रालय के डिजास्टर मैनेजमेंट डिवीजन और हिमालय पर्यावरण विशेषज्ञों की टीम ने एक चिंताजनक खोज की। उन्होंने पाया कि पूर्वोत्तर भारत की झीलें गंभीर खतरे में हैं। सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश की 129 झीलें, लद्दाख और कश्मीर की 26 झीलें, उत्तराखंड की 13 और हिमाचल प्रदेश की 20 झीलें – सभी अस्तित्व के संकट में हैं।

सिक्किम में दो ऑटोमेटेड स्टेशन, ये ग्लेशियरों को ट्रै​क कर रहे

सिक्किम में दो ऑटोमेटेड वेदर स्टेशन बनाए गए हैं, जो पूर्वोत्तर के संवेदनशील ग्लेशियर को ट्रैक कर रहे हैं। इन स्टेशनों से सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश के सभी ग्लेशियर का डेटा जमा किया जा रहा है। रिमोट सेंसिंग डेटा, सैटेलाइट इमेजरी और ग्राउंड जीरो से मिले तथ्यों को डेटा में शामिल किया जा रहा है।

उत्तराखंड में केंद्र-राज्य सरकार की दो अलग-अलग टीमें बनाई गई हैं। ये टीमें उत्तराखंड की ग्लेशियर झीलों की जांच करेंगी और नुकसान की आशंका का आकलन करेंगी। ये टीमें मई से काम शुरू करेंगी। यह खबर एक चेतावनी है कि हमें ग्लोबल वॉर्मिंग के प्रभावों को गंभीरता से लेना चाहिए।

हिमालय के ग्लेशियर: पिघलने की रफ्तार 15% तक बढ़ी, बड़ी तबाही की आशंका

हिमालय क्षेत्र में ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण 1.5 डिग्री पारा बढ़ने से ग्लेशियर के पिघलने की रफ्तार 15% तक बढ़ रही है। एक टीम ने सभी ग्लेशियर झीलों को जोखिम के आधार पर A-B-C-D कैटेगरी में बांटा था।

A कैटेगरी में अति संवेदनशील 188 झीलों को रखा गया। यहां पर ग्लेशियर के सबसे ज्यादा खिसकने और पिघलने का बेहद खतरनाक ट्रेंड दर्ज किया गया।

भूकंप अथवा अन्य कोई बड़ी प्राकृतिक आपदा की स्थिति में इन ग्लेशियर झीलों के फटने से बड़ी मात्रा में अचानक पानी का बहाव होगा, इससे आसपास के इलाकों में बड़ी तबाही की आशंका है। यह खबर एक चेतावनी है कि हमें ग्लोबल वॉर्मिंग के प्रभावों को गंभीरता से लेना चाहिए।

GLOF (Glacial Lake Outburst Flood) क्या होते हैं?

GLOF, यानी Glacial Lake Outburst Flood, एक प्रकार की बाढ़ होती है जो तब आती है जब ग्लेशियर झीलों में जमा पानी की बड़ी मात्रा अचानक बाहर निकल जाती है। यह घटना आमतौर पर तब होती है जब ग्लेशियरों के पिघलने, हिमस्खलन या भूकंप के कारण झील के बांध में दरार आ जाती है या वह टूट जाता है।

इस प्रक्रिया में, झील से निकलने वाला पानी तेजी से नीचे की ओर बहता है, जिससे निचले क्षेत्रों में बाढ़ आ सकती है और वहां के जीवन, संपत्ति और बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचा सकती है। GLOF की घटनाएं अक्सर अप्रत्याशित होती हैं और इनके परिणामस्वरूप भूस्खलन और कीचड़ का बहाव हो सकता है, जो पहाड़ी क्षेत्रों में विशेष रूप से गंभीर हो सकता है। इसलिए, GLOF के जोखिमों को कम करने और इसके प्रभावों को प्रबंधित करने के लिए एक अंतःविषय दृष्टिकोण की आवश्यकता है।

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