
देहरादून: उत्तराखंड में इस साल का फायर सीजन एक अनोखी चुनौती पेश कर रहा है। जहाँ एक ओर राज्य के जंगलों में आग लगने की कुल घटनाओं में पिछले सालों के मुकाबले कमी आई है, वहीं दूसरी ओर चारधाम यात्रा मार्ग, विशेषकर बदरीनाथ और केदारनाथ क्षेत्र, वनाग्नि के सबसे बड़े ‘हॉटस्पॉट’ बनकर उभरे हैं। पिछले ढाई महीनों के आंकड़ों ने वन विभाग और प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है।
आंकड़ों में वनाग्नि: गढ़वाल क्षेत्र सबसे अधिक प्रभावित
वन विभाग द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, इस सीजन में अब तक राज्यभर में वनाग्नि की कुल 276 घटनाएं दर्ज की गई हैं। इनका क्षेत्रीय विवरण इस प्रकार है:
- गढ़वाल क्षेत्र: 207 घटनाएं (सर्वाधिक)
- कुमाऊं क्षेत्र: 47 घटनाएं
- वाइल्ड लाइफ क्षेत्र: 22 घटनाएं
बदरी-केदार क्षेत्र में सबसे ज्यादा धधक रहे जंगल
हैरानी की बात यह है कि कुल 276 घटनाओं में से एक बड़ा हिस्सा केवल चमोली और रुद्रप्रयाग जिलों के उन हिस्सों में है, जहाँ चारधाम यात्रा की सबसे अधिक हलचल है।
- बदरीनाथ डिवीजन: 68 मामले (23.99 हेक्टेयर क्षेत्र प्रभावित)
- रुद्रप्रयाग डिवीजन: 32 मामले (22.82 हेक्टेयर क्षेत्र प्रभावित)
- केदारनाथ वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी: 21 मामले (10.2 हेक्टेयर क्षेत्र प्रभावित)
पूरे प्रदेश में पिथौरागढ़ के बाद चमोली और रुद्रप्रयाग ही ऐसे जिले हैं जहाँ वनाग्नि ने सबसे ज्यादा तांडव मचाया है।
मानवीय गतिविधियां या इत्तेफाक?
19 अप्रैल से शुरू हुई चारधाम यात्रा के बाद से इन क्षेत्रों में लाखों श्रद्धालुओं की आमद हुई है। केदारनाथ में अब तक 3 लाख और बदरीनाथ में 1.60 लाख से ज्यादा श्रद्धालु पहुँच चुके हैं। जानकारों का मानना है कि यात्रा मार्ग पर बढ़ती मानवीय गतिविधियों का सीधा असर वनाग्नि की घटनाओं पर पड़ रहा है। हालांकि वन विभाग सीधे तौर पर यात्रियों को जिम्मेदार नहीं ठहरा रहा, लेकिन विभाग का मानना है कि मानवीय हस्तक्षेप बढ़ने से आग लगने की संभावना बढ़ जाती है।
राहत की खबर: पिछले 3 सालों में सबसे ‘ठंडा’ रहा 2026
भले ही कुछ क्षेत्रों में चिंता बढ़ी हो, लेकिन समग्र रूप से साल 2026 पिछले सालों की तुलना में काफी बेहतर रहा है।
- अप्रैल 2026: 162 घटनाएं (154 हेक्टेयर प्रभावित)
- अप्रैल 2025: 184 घटनाएं
- अप्रैल 2024: 724 घटनाएं (942 हेक्टेयर प्रभावित)
- अप्रैल 2023: 195 घटनाएं
आंकड़े बताते हैं कि 2024 के मुकाबले इस साल वनाग्नि पर काफी हद तक नियंत्रण पाया गया है।
निगरानी के लिए ‘हाईटेक’ हुआ विभाग
बढ़ते खतरों को देखते हुए वन विभाग ने अपनी रणनीति बदल दी है:
- ड्रोन और सैटेलाइट: आग की तुरंत पहचान के लिए आधुनिक तकनीक का सहारा लिया जा रहा है।
- फायर वॉचर्स की तैनाती: संवेदनशील इलाकों में अतिरिक्त फायर वॉचर्स और क्विक रिस्पांस टीमें (QRT) तैनात की गई हैं।
- जन-भागीदारी: वन पंचायतों और स्थानीय संगठनों के साथ मिलकर जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं।
- अपील: यात्रियों और पर्यटकों से बार-बार अपील की जा रही है कि वे जंगलों के पास जलती हुई बीड़ी-सिगरेट न फेंकें और न ही आग जलाएं।
आगामी दिनों में श्रद्धालुओं की संख्या और बढ़ने की उम्मीद है। ऐसे में जंगलों की सुरक्षा के साथ-साथ यात्रियों की सुरक्षा भी दांव पर है। प्रशासन के लिए चुनौती यह है कि वह विकास और पर्यटन के उत्साह के बीच पर्यावरण की इस अनमोल संपदा को कैसे सुरक्षित रखे।
