
पुरी (ओडिशा): ओडिशा की समृद्ध और प्राचीन ताड़पत्र चित्रकला (Palm Leaf Art) को राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ी पहचान मिली है। प्रसिद्ध उद्योगपति मुकेश अंबानी के नेतृत्व वाले रिलायंस ग्रुप ने निमापाड़ा के राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता शिल्पकार शरत कुमार प्रधान द्वारा तैयार की गई एक ऐतिहासिक ताड़पत्र पेंटिंग को ₹20 लाख से अधिक की रिकॉर्ड कीमत पर खरीदा है। यह डील न केवल शरत प्रधान के 35 वर्षों के कठिन परिश्रम का सम्मान है, बल्कि पारंपरिक ओडिसी हस्तशिल्प कला के प्रति कॉर्पोरेट जगत के बढ़ते आकर्षण को भी दर्शाती है।

प्राचीन विरासत को दिया नया जीवन
कागज के आविष्कार से सदियों पहले ताड़ के पत्ते ही भारतीय ज्ञान, साहित्य और दर्शन को सहेजने का एकमात्र साधन थे। ओडिशा के ऋषियों और कवियों ने अपने महान ग्रंथों और कलाकृतियों को ताड़ के पत्तों पर ही जीवंत रखा था। इसी समृद्ध परंपरा को शरत प्रधान ने अपनी सूक्ष्म कलाकारी के जरिए एक नया आयाम दिया है।
शरत प्रधान की कलाकृतियों में मुख्य रूप से भगवान जगन्नाथ की संस्कृति, रथ यात्रा, रामायण, महाभारत और कृष्ण लीला के प्रसंगों को बेहद बारीकी से उकेरा जाता है। अंतरराष्ट्रीय और समकालीन खरीदारों की पसंद को ध्यान में रखते हुए उन्होंने ताड़ के पत्तों पर ‘ट्री ऑफ लाइफ’ (जीवन का वृक्ष) जैसी आधुनिक आकृतियों को भी स्थान दिया है, जिसे वैश्विक बाजार में खूब सराहा जा रहा है।

अत्यंत जटिल और बारीक है निर्माण प्रक्रिया
ताड़पत्र चित्रकला जितनी अद्भुत और मनमोहक दिखती है, इसके पीछे की निर्माण प्रक्रिया उतनी ही जटिल और श्रमसाध्य है:
- शुरुआती तैयारी: सबसे पहले ताड़ के पेड़ों से कच्चे पत्ते एकत्रित किए जाते हैं। इन्हें कीड़ों और सड़न से बचाने के लिए हल्दी और नीम की पत्तियों से युक्त गर्म पानी में उबाला जाता है। इसके बाद इन्हें धूप में सुखाकर समतल किया जाता है और निश्चित आकार में काटा जाता है।
- लेखनी का जादू: इस कला में किसी पारंपरिक ब्रश या स्याही वाले पेन का उपयोग नहीं किया जाता। कलाकार लोहे की एक नुकीली सुई जैसी ‘लेखनी’ का उपयोग करके सीधे पत्तों पर नक्काशी करते हैं। इस कला में एकाग्रता की बहुत आवश्यकता होती है, क्योंकि एक छोटी सी चूक भी पूरे पत्ते की मेहनत को बेकार कर सकती है।
- प्राकृतिक रंग का लेप: नक्काशी पूरी होने के बाद, पत्तों पर प्राकृतिक काले रंग का लेप लगाया जाता है, जिससे उकेरी गई महीन रेखाएं स्पष्ट और जादुई रूप से उभर कर आती हैं। इसी विशिष्टता के कारण ओडिशा सरकार ने इसे ‘ग्रुप-ए’ हस्तशिल्प की श्रेणी में रखा है।

गुरुओं की सीख और राष्ट्रीय सम्मान
शरत प्रधान पिछले साढ़े तीन दशकों से भी अधिक समय से इस कला की साधना कर रहे हैं। उन्होंने अपनी इस कलात्मक यात्रा के दौरान मास्टर आर्टिस्ट गोकुल बिहारी पटनायक और पद्मश्री विनोद महाराणा जैसे विख्यात गुरुओं से प्रशिक्षण प्राप्त किया है। कला के प्रति उनके इसी बेजोड़ समर्पण के लिए उन्हें भारत सरकार के वस्त्र मंत्रालय द्वारा:
- वर्ष 2012 में ‘सर्टिफिकेट ऑफ मेरिट’ प्रदान किया गया।
- वर्ष 2016 में देश के प्रतिष्ठित ‘नेशनल अवार्ड’ (राष्ट्रीय पुरस्कार) से अलंकृत किया गया।
युवा पीढ़ी के लिए उम्मीद की नई किरण: ‘भोलानाथ गुरुकुल’
ओडिशा के स्थानीय बुद्धिजीवियों और कला प्रेमियों द्वारा इस दुर्लभ कला को बचाने के लिए लंबे समय से सरकारी संरक्षण की मांग की जाती रही है। इस दिशा में स्वयं पहल करते हुए शरत प्रधान ने साल 2022 में ‘भोलानाथ गुरुकुल फाउंडेशन’ की स्थापना की। इस गुरुकुल का मुख्य उद्देश्य संघर्ष कर रहे स्थानीय कलाकारों को मंच प्रदान करना और नई पीढ़ी को इस पारंपरिक विरासत से जोड़ना है।
कॉर्पोरेट क्षेत्र के बड़े ब्रांड रिलायंस ग्रुप द्वारा ₹20 लाख से अधिक की कीमत पर इस कलाकृति को खरीदे जाने की खबर ने ओडिशा के ग्रामीण अंचलों में काम कर रहे युवा शिल्पकारों में एक नई उम्मीद जगाई है। यह घटना दर्शाती है कि यदि पारंपरिक शिल्पकला को धैर्य और निष्ठा के साथ सहेजा जाए, तो वह आज के दौर में भी कलाकारों को आर्थिक समृद्धि और सम्मान दिला सकती है।
