- अति-संकटग्रस्त (Critically Endangered) घड़ियालों के वैज्ञानिक संरक्षण के लिए शुरू हुई शोध परियोजना
- कॉर्बेट की रामगंगा नदी में 183 घड़ियाल, 197 मगरमच्छ और 161 ओटर्स (ऊदबिलाव) दर्ज
- मानसून से पहले का पहला सर्वे पूरा, बारिश के बाद शुरू होगा दूसरा चरण

रामनगर (नैनीताल) | विश्व प्रसिद्ध कॉर्बेट टाइगर रिजर्व (CTR) में अब बाघों के साथ-साथ गंभीर रूप से संकटग्रस्त (Critically Endangered) घड़ियालों के संरक्षण के लिए एक बड़ा अभियान शुरू किया गया है। भारत सरकार और भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) के सहयोग से शुरू हुई यह विशेष वैज्ञानिक शोध परियोजना अगले ढाई वर्षों तक चलेगी।
इस प्रोजेक्ट के जरिए घड़ियालों के प्राकृतिक आवास, उनकी सटीक आबादी और अंडे देने वाले स्थानों (नेस्टिंग साइट्स) का गहन वैज्ञानिक अध्ययन किया जाएगा।
कॉर्बेट में 183 घड़ियाल और 197 मगरमच्छ मौजूद
कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के डायरेक्टर डॉ. साकेत बडोला ने बताया कि कॉर्बेट से होकर बहने वाली रामगंगा नदी दुर्लभ जलीय जीवों का प्रमुख प्राकृतिक आवास है। हाल ही में किए गए सर्वेक्षण के अनुसार, कॉर्बेट क्षेत्र में 150 से 200 घड़ियालों की मौजूदगी दर्ज की गई है, जिनमें नर, मादा और बच्चे शामिल हैं।
कॉर्बेट में जलीय जीवों के नवीनतम आंकड़े:
- घड़ियाल: 183
- मगरमच्छ: 197
- ओटर्स (ऊदबिलाव): 161
नेस्टिंग साइट्स और खतरों की होगी जीआईएस मैपिंग
शोध के दौरान वैज्ञानिक इस बात का अध्ययन करेंगे कि घड़ियाल रामगंगा नदी के किन-किन तटों पर अंडे देते हैं और उन नेस्टिंग साइट्स को किन प्राकृतिक या मानवीय कारकों से खतरा है। अंडों से सुरक्षित बच्चे निकलने और उनके संरक्षण के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएंगे। इससे घड़ियालों की घटती आबादी को फिर से बढ़ाने में मदद मिलेगी।
मानसून के बाद शुरू होगा सर्वे का दूसरा चरण
परियोजना के तहत मानसून शुरू होने से पहले पहला सर्वेक्षण सफलतापूर्वक पूरा कर लिया गया है। अब मानसून की बारिश समाप्त होने के बाद सर्वे का दूसरा चरण शुरू किया जाएगा। ढाई वर्षों तक चलने वाले इस अध्ययन के निष्कर्ष केवल कॉर्बेट ही नहीं, बल्कि देशभर में घड़ियाल और जलीय जैव विविधता के संरक्षण की नीतियों का आधार बनेंगे।
‘देशभर में घड़ियाल संरक्षण के लिए मील का पत्थर बनेगी परियोजना’“भारत सरकार और WII के सहयोग से शुरू किए गए इस अध्ययन का मुख्य उद्देश्य घड़ियालों के प्राकृतिक आवास की मैपिंग, आबादी का आकलन और नेस्टing साइट्स का वैज्ञानिक विश्लेषण करना है। इससे भविष्य में इनके प्रभावी संरक्षण के लिए ठोस रणनीति तैयार की जा सकेगी।”— डॉ. साकेत बडोला, डायरेक्टर, कॉर्बेट टाइगर रिजर्व
