देवभूमि उत्तराखंड की पावन धरती पर स्थित मोक्षधाम बदरीनाथ में आज आस्था का सैलाब उमड़ पड़ा। वैदिक मंत्रोच्चार और सेना के बैंड की भक्तिमय धुन के बीच, आज दोपहर ठीक 2 बजकर 56 मिनट पर भगवान बदरीविशाल के कपाट शीतकाल के लिए विधि-विधान के साथ बंद कर दिए गए।
कड़कड़ाती ठंड और बर्फबारी की संभावनाओं के बीच हजारों श्रद्धालु अपने आराध्य को विदाई देने के लिए धाम में मौजूद रहे। जैसे ही रावल (मुख्य पुजारी) ने कपाट बंद करने की अंतिम प्रक्रिया पूरी की, पूरी नीलकंठ घाटी ‘जय बदरीविशाल’ के गगनभेदी जयकारों से गुंजायमान हो उठी।
अनोखी परंपरा: स्त्री रूप में रावल ने की पूजा
कपाट बंद होने की प्रक्रिया अत्यंत भावपूर्ण और पौराणिक परंपराओं से परिपूर्ण रही। मुख्य पुजारी (रावल) ने स्त्री वेश धारण कर माँ लक्ष्मी को भगवान बदरीनाथ के सानिध्य में गर्भ गृह में विराजमान कराया। मान्यता है कि अब अगले 6 माह तक नारद मुनि और देवतागण ही भगवान की पूजा करेंगे, इसलिए मनुष्यों द्वारा पूजा का अधिकार अब देवताओं को सौंप दिया गया है।
पंच पूजा का हुआ समापन
पिछले पांच दिनों से चल रही ‘पंच पूजा’ का भी आज समापन हो गया।
अब यहां होंगे दर्शन
शीतकाल के दौरान भगवान बदरीविशाल की पूजा उनके शीतकालीन प्रवास स्थल जोशीमठ के नरसिंह मंदिर और पांडुकेश्वर में होगी। श्रद्धालु अब अगले छह माह तक अपने आराध्य के दर्शन इन्हीं स्थानों पर कर सकेंगे।
श्रद्धालुओं ने नम आंखों से भगवान को विदाई दी और अगले वर्ष 2026 में पुन: दर्शन की कामना के साथ अपने घरों को लौटे।
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