
प्रमुख बिंदु:
- योजना: मेरठ-प्रयागराज गंगा एक्सप्रेस-वे को हरिद्वार से जोड़ने के लिए अधिग्रहित की जानी है जमीन।
- विरोध: जमालपुर महापंचायत में आधा दर्जन गांवों के किसानों का फैसला- ‘उपजाऊ जमीन नहीं देंगे’।
- सुझाव: किसानों ने डीएम को सौंपा ज्ञापन, बोले- कृषि भूमि की जगह गंगा किनारे से निकाला जाए एक्सप्रेस-वे।
- मांग: प्रभावित परिवारों के पुनर्वास, मुआवजे और परिवार के एक सदस्य को रोजगार देने की मांग रखी।
हरिद्वार।
उत्तराखंड के हरिद्वार जिले में प्रस्तावित गंगा एक्सप्रेस-वे विस्तार परियोजना को स्थानीय स्तर पर बड़ा झटका लगा है। जमालपुर और सराय क्षेत्र के किसानों ने अपनी उपजाऊ कृषि भूमि अधिग्रहित कराने से साफ इनकार कर दिया है। किसानों ने जमालपुर कलां में महापंचायत आयोजित करने के बाद जिलाधिकारी को ज्ञापन सौंपकर अपनी आपत्तियां और मांगें दर्ज कराई हैं।
दरअसल, उत्तर प्रदेश के मेरठ-प्रयागराज गंगा एक्सप्रेस-वे को हरिद्वार से जोड़ने की योजना बनाई जा रही है। इसके तहत हरिद्वार जिले के कई गांवों की भूमि का अधिग्रहण प्रस्तावित है।
महापंचायत में एकमुश्त फैसला: ‘सिंचित जमीन नहीं देंगे’
जमालपुर कलां के रामलीला मैदान में प्रभावित गांवों के किसानों की महापंचायत आयोजित की गई। इस बैठक में जमालपुर कलां, बहादुरपुर जट, गाडोवाली, किशनपुर, कटारपुर फैरुपुर और रानी माजरा के सैकड़ों किसान शामिल हुए। महापंचायत में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि कोई भी किसान एक्सप्रेस-वे के लिए अपनी उपजाऊ और सिंचित कृषि भूमि नहीं देगा।
गंगा किनारे एक्सप्रेस-वे बनाने के गिनाए 3 बड़े फायदे
जिलाधिकारी को सौंपे ज्ञापन में किसानों ने कहा कि वे देश और प्रदेश के विकास का स्वागत करते हैं, लेकिन अन्नदाताओं की आजीविका की कीमत पर विकास स्वीकार्य नहीं है। किसानों ने प्रशासन को विकल्प देते हुए कहा कि एक्सप्रेस-वे को कृषि भूमि के बजाय गंगा नदी के किनारे-किनारे बनाया जाए। किसानों ने इसके तीन प्रमुख फायदे बताए:
- बाढ़ से सुरक्षा: गंगा के तट पर एक्सप्रेस-वे बनने से यह प्राकृतिक तटबंध (Embankment) का काम करेगा, जिससे हर साल गांवों में आने वाली बाढ़ की समस्या खत्म होगी।
- मानव-वन्यजीव संघर्ष पर रोक: नदी किनारे हाईवे बनने से राजाजी नेशनल पार्क और जंगलों से निकलकर आबादी वाले क्षेत्रों में आने वाले हाथियों व जंगली जानवरों की आवाजाही रुकेगी।
- उपेक्षित गांवों का विकास: गंगा किनारे बसे वे गांव भी मुख्यधारा से जुड़ेंगे, जो अब तक विकास की दौड़ में पीछे छूट गए थे।
पुनर्वास, रोजगार और जल निकासी की मांग
किसानों ने अपनी मांगों का ब्योरा देते हुए कहा कि जिन परिवारों की आजीविका पूरी तरह से अधिग्रहित जमीन पर टिकी है, उनके उचित पुनर्वास की व्यवस्था की जाए। साथ ही परिवार के कम से कम एक सदस्य को रोजगार या उचित आर्थिक सहायता दी जाए।
किसानों ने यह भी चेतावनी दी कि हाईवे निर्माण के कारण खेतों की पारंपरिक जल निकासी और सिंचाई व्यवस्था प्रभावित नहीं होनी चाहिए, ताकि भविष्य में जलभराव से फसलें खराब न हों।
ज्ञापन सौंपने वालों में ये रहे शामिल:
प्रशासन को ज्ञापन देने वाले प्रतिनिधिमंडल में परमिल, विकास, अंकित, सुरेंद्र पाल, अतुल कुमार और बृजमोहन सिंह समेत कई प्रमुख किसान नेता व ग्रामीण मौजूद रहे। किसानों ने प्रशासन से अपील की है कि वे उनकी मांगों पर सकारात्मक रुख अपनाएं, ताकि किसान शांतिपूर्ण तरीके से सहयोग कर सकें।
