
देहरादून: उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय (हर्रावाला) में लंबे समय से चल रहे भ्रष्टाचार और नियमों के उल्लंघन के मामले में शासन ने बड़ा कदम उठाया है। विश्वविद्यालय में कर्मचारियों के नियम विरुद्ध नियमितिकरण और पदोन्नति के खेल में अब विजिलेंस (सतर्कता विभाग) प्राथमिकी (FIR) दर्ज करने जा रही है। शुक्रवार को शासन ने इस संबंध में औपचारिक अनुमोदन दे दिया है।
मुख्य सचिव की अध्यक्षता में मिली हरी झंडी
हाल ही में मुख्य सचिव आनंद वर्द्धन की अध्यक्षता में सतर्कता समिति की एक महत्वपूर्ण बैठक हुई थी। इस बैठक में विजिलेंस ने अपनी जांच रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें विश्वविद्यालय के भीतर गंभीर वित्तीय और प्रशासनिक अनियमितताओं की पुष्टि हुई। रिपोर्ट के आधार पर समिति ने विजिलेंस को एफआईआर दर्ज करने की अनुमति दी थी, जिसे शासन ने अब लिखित रूप में जारी कर दिया है।
क्या है पूरा मामला?
आयुर्वेद विश्वविद्यालय में अनियमितताओं की जड़ें काफी गहरी हैं। जांच में दो मुख्य मामले सामने आए हैं:
- अवैध नियमितिकरण: वर्ष 2012-13 में नियमों को ताक पर रखकर कई मिनिस्ट्रीयल कर्मचारियों को नियमित किया गया था। आरोप है कि अधिकारियों ने अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करते हुए अपात्र लोगों को लाभ पहुँचाया।
- गलत पदोन्नति: वर्ष 2014-15 में भी कई कर्मचारियों को नियमों के खिलाफ जाकर पदोन्नति दी गई थी। विजिलेंस की प्रारंभिक जांच में इन पदोन्नतियों में भी भारी हेरफेर पाया गया है।
हर्रावाला स्थित यह विश्वविद्यालय पहले भी कई बार घोटालों के कारण सुर्खियों में रहा है। इससे पहले वर्ष 2022 में सामग्री खरीद-फरोख्त और अन्य वित्तीय गबन के मामले में जांच शुरू हुई थी। इसके बाद 2023 में विजिलेंस ने जिम्मेदारों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी, जिसमें चार्जशीट भी दाखिल की जा चुकी है। अब नियमितिकरण का यह नया मामला विश्वविद्यालय की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।
शासन से लिखित आदेश मिलने के बाद अब विजिलेंस जल्द ही इस मामले में मुकदमा दर्ज करेगी। सूत्रों के अनुसार, प्राथमिक जांच में दोषी पाए गए अधिकारियों और अन्य जिम्मेदारों को इस एफआईआर में नामजद किया जाएगा। इससे विश्वविद्यालय प्रशासन और तत्कालीन जिम्मेदार अधिकारियों में हड़कंप मचा हुआ है।
