देहरादून:सर्दियों का मौसम अपने चरम पर है, लेकिन हिमालय की चोटियां, जो इस समय बर्फ की सफेद चादर से ढकी होनी चाहिए थीं, वे सूखी और वीरान पड़ी हैं। वैज्ञानिकों ने इस स्थिति को ‘बर्फ का सूखा’ (Snow Drought) नाम दिया है। जलवायु परिवर्तन और अल नीनो के प्रभाव के कारण हिमालयी क्षेत्रों में बर्फबारी और बारिश के आंकड़े बेहद चिंताजनक हैं।
आंकड़े दे रहे खतरे की गवाही
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) और सैटेलाइट डेटा से प्राप्त आंकड़े एक डरावनी तस्वीर पेश करते हैं:
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मौसम में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया, तो 2025 इस सदी का सबसे सूखा साल साबित हो सकता है।
क्यों नहीं गिर रही बर्फ?
वैज्ञानिकों के अनुसार, इसके पीछे मुख्य वजह ग्लोबल वार्मिंग (Global Warming) और अल नीनो (El Niño) का प्रभाव है। बढ़ते तापमान के कारण बर्फ न केवल कम गिर रही है, बल्कि जो गिरती है वह भी जल्दी पिघल जाती है। पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbance) के कमजोर होने के कारण अफगानिस्तान, पाकिस्तान और उत्तर भारत के पहाड़ों में गंभीर सूखा पड़ा है।
जल संकट और नदियों पर असर
बर्फ की कमी का सीधा असर एशिया की सबसे महत्वपूर्ण जल प्रणालियों पर पड़ रहा है। सिंधु, गंगा, ब्रह्मपुत्र और झेलम नदी घाटियों में बर्फ की परत (Snow Cover) में भारी गिरावट आई है।
पर्यटन और खेती की कमर टूटी
बर्फ के अभाव में स्थानीय अर्थव्यवस्था के दो मुख्य स्तंभ—पर्यटन और कृषि—बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं।
विशेषज्ञों की चेतावनी
IMD कश्मीर के निदेशक डॉ. मुख्तार अहमद ने स्थिति को गंभीर बताते हुए कहा, “पिछले 4-5 सालों से सर्दियों में बारिश और बर्फबारी लगातार कम हो रही है। आने वाले दिनों में भी किसी बड़ी राहत का पूर्वानुमान नहीं है। अगर ग्लेशियरों की भरपाई नहीं हुई, तो भविष्य में पीने के पानी, हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर और खेती के लिए गंभीर संकट खड़ा हो जाएगा।”
हिमालय दुनिया के औसत तापमान से ज्यादा तेजी से गर्म हो रहा है। यह न केवल पहाड़ों पर रहने वालों के लिए, बल्कि मैदानी इलाकों में नदियों पर निर्भर करोड़ों लोगों के लिए खतरे की घंटी है।
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