देहरादून: देवभूमि उत्तराखंड में सालभर चलने वाले धार्मिक पर्यटन और तीर्थाटन ने राज्य की अर्थव्यवस्था को तो रफ्तार दी है, लेकिन इसके साथ ही नाजुक हिमालयी पर्यावरण पर गंभीर संकट खड़ा कर दिया है। चारधाम यात्रा, हेमकुंड साहिब और कांवड़ यात्रा के दौरान आने वाले करोड़ों श्रद्धालुओं द्वारा छोड़े गए प्लास्टिक, पैकेजिंग और कचरे के वैज्ञानिक निस्तारण के लिए अब उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (UKPCB) एक विशेष ‘पर्यावरणीय एक्शन प्लान’ तैयार कर रहा है।
अब तक यात्रा सीजन खत्म होने के बाद केवल अस्थायी सफाई अभियान चलाए जाते थे, लेकिन अब सरकार इस कचरा संकट का स्थायी समाधान निकालने जा रही है। इसके तहत तीर्थ स्थलों और यात्रा मार्गों पर 12 महीने काम करने वाला आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया जाएगा, जिसके लिए केंद्र सरकार से विशेष बजट की मांग की गई है।
उत्तराखंड की भौगोलिक संरचना बेहद संवेदनशील और विषम है।
प्रस्तावित पर्यावरणीय एक्शन प्लान केवल श्रद्धालुओं की सुविधाओं तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका केंद्र बिंदु राज्य की पर्यावरणीय सेहत सुधारना है:
“करोड़ों लोग धार्मिक पर्यटन के लिए उत्तराखंड पहुंच रहे हैं, इसे देखते हुए पर्यावरण संरक्षण की व्यवस्थाओं को भी उसी स्तर पर मजबूत करना जरूरी है। हमने केंद्र सरकार से विशेष बजट की मांग की है ताकि भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए स्थायी इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया जा सके।”— पराग मधुकर धकाते, सदस्य सचिव, उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड
“धार्मिक यात्राओं के बाद कचरा प्रबंधन बेहद संवेदनशील और गंभीर विषय है। कांवड़ यात्रा के बाद भी प्रशासन ने त्वरित कार्रवाई करते हुए व्यापक सफाई अभियान चलाया। नदियों और घाटों को स्वच्छ रखना हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है।”— आनंद स्वरूप, गढ़वाल कमिश्नर
उत्तराखंड एक हिमालयी राज्य है, जहां प्राकृतिक आपदाओं (भूस्खलन, बादल फटना, बाढ़) का खतरा हमेशा बना रहता है। राज्य के सीमित वित्तीय संसाधनों के कारण इतने बड़े स्तर पर सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट तकनीक लगाना संभव नहीं है।
यदि केंद्र से ‘स्पेशल एनवायरनमेंटल बजट’ स्वीकृत होता है, तो:
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