साल के 12 महीने करोड़ों श्रद्धालुओं की आवाजाही से नदियां-पहाड़ प्रदूषित; अस्थायी सफाई छोड़ अब 365 दिन चलने वाले परमानेंट इंफ्रास्ट्रक्चर की तैयारी

देहरादून: देवभूमि उत्तराखंड में सालभर चलने वाले धार्मिक पर्यटन और तीर्थाटन ने राज्य की अर्थव्यवस्था को तो रफ्तार दी है, लेकिन इसके साथ ही नाजुक हिमालयी पर्यावरण पर गंभीर संकट खड़ा कर दिया है। चारधाम यात्रा, हेमकुंड साहिब और कांवड़ यात्रा के दौरान आने वाले करोड़ों श्रद्धालुओं द्वारा छोड़े गए प्लास्टिक, पैकेजिंग और कचरे के वैज्ञानिक निस्तारण के लिए अब उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (UKPCB) एक विशेष ‘पर्यावरणीय एक्शन प्लान’ तैयार कर रहा है।
अब तक यात्रा सीजन खत्म होने के बाद केवल अस्थायी सफाई अभियान चलाए जाते थे, लेकिन अब सरकार इस कचरा संकट का स्थायी समाधान निकालने जा रही है। इसके तहत तीर्थ स्थलों और यात्रा मार्गों पर 12 महीने काम करने वाला आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया जाएगा, जिसके लिए केंद्र सरकार से विशेष बजट की मांग की गई है।
मामले से जुड़ी 4 बड़ी बातें
- 12 महीने दबाव: 6 महीने की चारधाम यात्रा, कांवड़ यात्रा और हेमकुंड साहिब के चलते राज्य में सालभर करोड़ों यात्रियों की आवाजाही रहती है।
- नदियों और घाटों पर संकट: पैकेजिंग और सिंगल-यूज प्लास्टिक गंगा और उसकी सहायक नदियों तक पहुंच रहा है, जिससे जल स्रोत दूषित हो रहे हैं।
- अस्थायी से स्थायी व्यवस्था: सीजनल झाड़ू-सफाई के बजाय कचरा संग्रहण, ट्रांसपोर्टेशन और रीसाइक्लिंग का मजबूत 365-डे नेटवर्क बनेगा।
- केंद्र से बजट की दरकार: उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने केंद्र सरकार को विस्तृत प्रस्ताव भेजा है ताकि हिमालयी संवेदनशील क्षेत्रों को प्राथमिकता मिल सके।
पहाड़ों पर कचरा निस्तारण मैदानी इलाकों से कई गुना मुश्किल
उत्तराखंड की भौगोलिक संरचना बेहद संवेदनशील और विषम है।
- कठिन रूट: दुर्गम पहाड़ी रास्तों, संकरी घाटियों और ऊंचे पड़ावों से टन के हिसाब से कचरा इकट्ठा करना और उसे नीचे लाना बेहद खर्चीला व श्रमसाध्य काम है।
- पारिस्थितिकी पर चोट: पहाड़ों में डंपिंग या खुले में कचरा फेंकने से सीधे तौर पर स्थानीय ग्लेशियर, नदियां और वन्यजीव प्रभावित हो रहे हैं।
- कांवड़ के बाद भारी अवशिष्ट: हाल ही में संपन्न हुई कांवड़ यात्रा के बाद हरिद्वार और आसपास के घाटों पर भारी मात्रा में कचरा जमा हुआ, जिसे हटाने के लिए नगर निगम और प्रशासन को हफ्तों तक विशेष अभियान चलाना पड़ा।
एक्शन प्लान में क्या होगा खास?
प्रस्तावित पर्यावरणीय एक्शन प्लान केवल श्रद्धालुओं की सुविधाओं तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका केंद्र बिंदु राज्य की पर्यावरणीय सेहत सुधारना है:
- स्थायी वेस्ट मैनेजमेंट यूनिट्स: चारों धामों (बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री), हेमकुंड साहिब और प्रमुख पड़ावों पर आधुनिक वेस्ट प्रोसेसिंग प्लांट्स।
- नदियों के किनारे जीरो-वेस्ट जोन: गंगा और सहायक नदियों के 500 मीटर के दायरे में कचरा फेंकने पर सख्त निगरानी और तुरंत प्रोसेसिंग।
- एंड-टू-एंड सिस्टम: कूड़ा पैदा होने (सोर्स) से लेकर उसके अंतिम वैज्ञानिक निस्तारण (साइंटिफिक डिस्पोजल) तक पूरी चेन तैयार होगी।
- ग्रीन ट्रांसपोर्टेशन: यात्रा मार्गों पर कचरा ढुलाई के लिए विशेष रूप से डिजाइन किए गए वाहनों की तैनाती।
जिम्मेदार बोले- अब बड़े स्तर पर स्थायी समाधान की जरूरत
“करोड़ों लोग धार्मिक पर्यटन के लिए उत्तराखंड पहुंच रहे हैं, इसे देखते हुए पर्यावरण संरक्षण की व्यवस्थाओं को भी उसी स्तर पर मजबूत करना जरूरी है। हमने केंद्र सरकार से विशेष बजट की मांग की है ताकि भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए स्थायी इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया जा सके।”— पराग मधुकर धकाते, सदस्य सचिव, उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड
“धार्मिक यात्राओं के बाद कचरा प्रबंधन बेहद संवेदनशील और गंभीर विषय है। कांवड़ यात्रा के बाद भी प्रशासन ने त्वरित कार्रवाई करते हुए व्यापक सफाई अभियान चलाया। नदियों और घाटों को स्वच्छ रखना हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है।”— आनंद स्वरूप, गढ़वाल कमिश्नर
क्यों जरूरी है केंद्र का विशेष वित्तीय पैकेज?
उत्तराखंड एक हिमालयी राज्य है, जहां प्राकृतिक आपदाओं (भूस्खलन, बादल फटना, बाढ़) का खतरा हमेशा बना रहता है। राज्य के सीमित वित्तीय संसाधनों के कारण इतने बड़े स्तर पर सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट तकनीक लगाना संभव नहीं है।
यदि केंद्र से ‘स्पेशल एनवायरनमेंटल बजट’ स्वीकृत होता है, तो:
- ‘नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा’ (NMCG) के प्रयासों को जमीनी स्तर पर मजबूती मिलेगी।
- सीजन खत्म होने पर सफाई करने की मजबूरी खत्म होगी और कूड़े का रोजाना वैज्ञानिक निस्तारण संभव हो सकेगा।
- स्थानीय तीर्थ नगरियों और संवेदनशील घाटी क्षेत्रों पर मानवीय गतिविधियों का दबाव कम किया जा सकेगा।
