
रुड़की :उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र की जीवनरेखा मानी जाने वाली कोसी नदी बेसिन पर आने वाले दशकों में जलवायु परिवर्तन का गंभीर असर देखने को मिलेगा। आईआईटी रुड़की और जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक हालिया अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि सदी के अंत तक क्षेत्र के तापमान में भारी बढ़ोतरी होगी और भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge) में 20% से अधिक की गिरावट आ सकती है। इससे पेयजल, खेती और हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र पर गहरा संकट मंडरा सकता है।
यह शोध प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जर्नल ‘थियोरेटिकल एंड एप्लाइड क्लाइमेटोलॉजी’ (Theoretical and Applied Climatology) में प्रकाशित हुआ है।
खास बातें (रिसर्च के मुख्य आंकड़े):
- 43.2°C तक पहुंचेगा पारा: वर्तमान में अधिकतम तापमान औसतन 38.4°C रहता है, जो उच्च कार्बन उत्सर्जन की स्थिति में सदी के अंत तक 43.2°C तक पहुंच सकता है।
- भूजल पुनर्भरण 20% से ज्यादा घटेगा: जमीन के भीतर पानी के रिसाव (Infiltration) में कमी आएगी, जिससे कुएं और प्राकृतिक नौले सूखने की कगार पर पहुंचेंगे।
- जल उपलब्धता में 4 से 7% की कमी: साल 2100 तक नदी बेसिन की कुल जल उपलब्धता (Water Yield) में गिरावट का अनुमान है।
- वाष्पोत्सर्जन 13% बढ़ेगा: बढ़ते तापमान के कारण वाष्पीकरण की दर 13% तक बढ़ जाएगी।
- सतही अपवाह (Runoff) 20% बढ़ेगा: बारिश का पानी जमीन में रुकने के बजाय तेजी से बह जाएगा, जिससे सूखे और मौसमी बाढ़ दोनों का खतरा बढ़ेगा।
5 प्रमुख ग्लोबल क्लाइमेट मॉडल्स से किया गया आकलन
यह रिसर्च आईआईटी रुड़की के डॉ. बी. दास, डॉ. एस. सेन और जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान के डॉ. संदीपन मुखर्जी ने मिलकर की है। वैज्ञानिकों ने 5 वैश्विक जलवायु मॉडल्स के अनुमानों को ‘सॉइल एंड वाटर असेसमेंट टूल’ (SWAT) मॉडल के साथ जोड़कर कोसी नदी बेसिन के जलवैज्ञानिक चक्र (Hydrological Cycle) पर संभावित असर का सटीक आकलन किया है।
प्राकृतिक स्रोतों पर निर्भरता, सूखे की घटनाएं होंगी लंबी
पहाड़ी क्षेत्रों में आबादी मुख्यतः नौले, धारे और प्राकृतिक चश्मों पर निर्भर करती है। अध्ययन में आगाह किया गया है कि भविष्य में सूखे की घटनाएं न केवल बार-बार होंगी, बल्कि अधिक लंबे समय तक खिंच सकती हैं। इससे स्थानीय समुदायों की पेयजल आपूर्ति और फसलों की पैदावार बुरी तरह प्रभावित हो सकती है।
विशेषज्ञों के बयान:
“जलवायु परिवर्तन पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र की जल सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। इस प्रकार के वैज्ञानिक अध्ययन नीति-निर्माताओं को ठोस डेटा के आधार पर दीर्घकालिक नीतियां और अनुकूलन रणनीतियां तैयार करने में मदद करते हैं।”— प्रो. कमल किशोर पंत, निदेशक, IIT रुड़की
“यह अध्ययन हिमालयी जलग्रहण क्षेत्रों की जल प्रणाली में बड़े बदलाव का संकेत देता है। बढ़ते तापमान से पानी का वाष्पीकरण बढ़ेगा और भूजल रीचार्ज घटेगा। इससे निपटने के लिए सक्रिय अनुकूलन उपायों और विज्ञान-आधारित जल प्रबंधन को अपनाना बेहद जरूरी है।”— डॉ. आई.डी. भट्ट, निदेशक, जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान
संकट से बचने के उपाय: शोधकर्ताओं के 4 बड़े सुझाव
वैज्ञानिकों ने कोसी नदी बेसिन को बचाने के लिए नीतिगत स्तर पर निम्नलिखित कदम उठाने पर जोर दिया है:
- जलागम प्रबंधन (Watershed Management): कैचमेंट क्षेत्रों में वैज्ञानिक तरीके से जल संचयन और प्रबंधन करना।
- पारंपरिक जलस्रोतों का जीर्णोद्धार: सूख रहे धारों और नौलों को रिचार्ज करने के लिए चाल-खाल और खंतियों का निर्माण।
- मृदा एवं जल संरक्षण: मिट्टी के कटाव को रोकने के लिए चेकडैम और कंटूर ट्रेंचिंग।
- प्रकृति-आधारित समाधान (Nature-based Solutions): ढलानों पर सघन वनरोपण ताकि सतही बहाव रुके और पानी जमीन के भीतर रिस सके।
