देहरादून। लंबे समय से भू-धंसाव और मकानों में दरारों की मार झेल रहे ज्योतिर्मठ (पूर्व में जोशीमठ) के पेट में आखिर चल क्या रहा है, इसका जवाब अब अनुमानों से नहीं बल्कि वैज्ञानिक आंकड़ों से मिलेगा। उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (USDMA) की बैठक में तय हुआ है कि ज्योतिर्मठ और उसके आसपास के संवेदनशील इलाकों में ट्रायल बेस पर एक हाईटेक भूगर्भीय ऑब्जर्वेटरी (Geological Observatory) स्थापित की जाएगी।
यह ऑब्जर्वेटरी मुख्य रूप से भूकंपीय गतिविधियों, जमीन के बैठने (भू-धंसाव) की गति और भूजल (Groundwater) की आंतरिक हलचल पर लगातार निगरानी रखेगी।
ज्योतिर्मठ का पूरा क्षेत्र लंबे समय से अति संवेदनशील श्रेणी में है। मकानों में दरारें पड़ना, ढलानों का खिसकना और जमीन का धीरे-धीरे बैठना यहाँ की मुख्य समस्या है। विशेषज्ञों के अनुसार, समस्या का स्थायी समाधान तब तक संभव नहीं है, जब तक यह न पता चले कि धंसाव के पीछे भूकंपीय हलचल कितनी है, भूजल का बहाव किस दिशा में है और ढलान की बनावट में क्या बदलाव आ रहे हैं। यह ऑब्जर्वेटरी इसी वैज्ञानिक तस्वीर को साफ करेगी।
हिमालयी क्षेत्र में भूकंप और भूस्खलन के सटीक अध्ययन के लिए देश की 5 शीर्ष संस्थाओं को इस पहल में शामिल किया गया है:
शुरुआत में ट्रायल के तौर पर आधुनिक सेंसर और उपकरण लगाए जाएंगे। ऑब्जर्वेटरी से प्राप्त शुरुआती डेटा के आधार पर इसका दायरा और बढ़ाया जाएगा।
आपदा प्रबंधन विभाग के सचिव विनोद कुमार सुमन ने बताया:
“ज्योतिर्मठ में ऑब्जर्वेटरी स्थापित करने पर सहमति बन गई है। इसके लिए भूमि की मांग की गई है, जिसका आवंटन जल्द कर दिया जाएगा। जमीन मिलने के बाद वहां उपकरण लगाकर लॉन्ग-टर्म मॉनिटरिंग की जाएगी। यह ऑब्जर्वेटरी मुख्य रूप से भूकंप और भूस्खलन के कारणों का पता लगाएगी। इसी वैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर क्षेत्र में भावी निर्माण और विकास कार्यों की दिशा तय होगी।”
अब तक ज्योतिर्मठ को लेकर अधिकांश फैसले तात्कालिक सर्वे या अनुमानों के आधार पर लिए जा रहे थे। लेकिन इस भूगर्भीय ऑब्जर्वेटरी से मिलने वाला डेटा भविष्य में ज्योतिर्मठ के भवन निर्माण नियमों (Building Bylaws), वहन क्षमता (Carrying Capacity) और पुनर्वास योजनाओं (Rehabilitation Plans) को नए सिरे से तय करने में निर्णायक भूमिका निभाएगा।
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