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केदारनाथ आपदा के बोल्डर अब बनेंगे आस्था की पहचान: पत्थरों पर उकेरी जा रहीं शिव लीलाएं, 2026 तक पूरा होगा प्रोजेक्ट

देहरादून/रुद्रप्रयाग:
देवभूमि उत्तराखंड स्थित केदारनाथ धाम, जो 2013 में भीषण जल प्रलय और विनाश का गवाह बना था, अब उसी विनाश के अवशेषों से आस्था की नई इबारत लिख रहा है। आपदा के दौरान जो विशालकाय बोल्डर (पत्थर) तबाही मचाते हुए आए थे, उन्हें अब भगवान शिव की भक्ति के प्रतीक के रूप में बदला जा रहा है। इन पत्थरों पर भगवान शंकर के विभिन्न रूपों और मुद्राओं को उकेरा जा रहा है।

विनाश से सृजन की ओर
केदारनाथ धाम के पुनर्निर्माण कार्यों के तहत यह अनूठी पहल की गई है। सोनप्रयाग से लेकर केदारनाथ धाम तक के रास्ते में और मंदिर परिसर के आसपास पड़े विशाल पत्थरों को हटाने के बजाय, उन्हें ‘कैनवास’ के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। शिल्पकारों की एक विशेष टीम इन कठोर चट्टानों पर छेनी-हथोड़े से ‘शिव तांडव’, ध्यान मुद्रा और शिव कथाओं को जीवंत कर रही है।

क्या है खास इस प्रोजेक्ट में?

  1. शिव तांडव स्तोत्र का चित्रण: पत्थरों पर केवल सामान्य चित्र ही नहीं, बल्कि शिव तांडव स्तोत्र के दृश्यों और श्लोकों के भावों को भी उकेरा जा रहा है।
  2. ओपन आर्ट गैलरी: केदारनाथ यात्रा मार्ग अब एक ‘ओपन आर्ट गैलरी’ जैसा प्रतीत होगा। भक्त पैदल मार्ग पर चलते हुए बाबा केदार के दर्शन से पहले ही उनकी लीलाओं का अनुभव कर सकेंगे।
  3. 2026 की डेडलाइन: प्रशासन के अनुसार, केदारनाथ पुनर्निर्माण के दूसरे चरण और सौंदर्यीकरण के कार्यों के साथ-साथ इस प्रोजेक्ट को भी 2026 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।

पर्यटन और आध्यात्म का संगम
अधिकारियों का कहना है कि यह प्रयास केदारनाथ आने वाले लाखों श्रद्धालुओं के अनुभव को और भी दिव्य बनाएगा। जो पत्थर कभी 2013 की आपदा के डर की याद दिलाते थे, अब वे श्रद्धालुओं के लिए ‘सेल्फी प्वाइंट’ और नमन स्थल बन रहे हैं।

यह प्रोजेक्ट प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के केदारनाथ को भव्य और दिव्य बनाने के सपने का एक अहम हिस्सा है। उम्मीद की जा रही है कि जब 2026 में यह कार्य पूर्ण होगा, तो केदार घाटी की तस्वीर पूरी तरह बदली हुई नजर आएगी, जहाँ प्रकृति और संस्कृति का अद्भुत संगम होगा।

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