UTTARAKHAND

दुनिया का सबसे ऊंचा शिव मंदिर झुका; CBRI रुड़की वैज्ञानिक तकनीक से बचाएगा 1000 साल पुराना तुंगनाथ मंदिर

रुड़की: हिमालय की गोद में, समुद्र तल से 12 हजार फीट से अधिक की ऊंचाई पर स्थित भगवान शिव के विश्व प्रसिद्ध तुंगनाथ मंदिर को सुरक्षित रखने के लिए एक ऐतिहासिक वैज्ञानिक पहल शुरू की गई है। 1,000 साल पुरानी इस प्राचीन धरोहर में आए संरचनात्मक झुकाव (structural tilt) के बाद, देश के अग्रणी संस्थान केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान (CBRI) रुड़की ने इसके संरक्षण की जिम्मेदारी संभाल ली है। आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों के जरिए इस ऐतिहासिक धरोहर का उपचार किया जाएगा, ताकि इसकी मजबूती बरकरार रहे।

क्यों पड़ी संरक्षण की जरूरत?

  • 5 से 6 डिग्री का झुकाव: उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित मुख्य तुंगनाथ मंदिर में लगभग 5 से 6 डिग्री का झुकाव आ गया है .
  • 10 डिग्री तक झुके छोटे मंदिर: भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की रिपोर्ट के अनुसार, मुख्य मंदिर परिसर की छोटी संरचनाओं में 10 डिग्री तक का झुकाव देखा गया है.
  • नुकसान की वजह: अत्यधिक ऊंचाई, चट्टानों का खिसकना, भूकंपीय गतिविधियां और भारी बर्फबारी जैसी प्राकृतिक परिस्थितियों को इस प्राचीन मंदिर को पहुंचे नुकसान का मुख्य कारण माना जा रहा है .
  • राष्ट्रीय महत्व का स्मारक: इस अमूल्य धरोहर को बचाने के लिए एएसआई और केंद्र सरकार ने इसे ‘राष्ट्रीय महत्व के स्मारक’ का दर्जा देकर इसके संरक्षण की प्रक्रिया शुरू की है .

कैसे होगा मंदिर का वैज्ञानिक उपचार?

CBRI के निदेशक प्रोफेसर आर प्रदीप कुमार ने बताया कि संरक्षण की प्रक्रिया को बेहद वैज्ञानिक और चरणबद्ध तरीके से पूरा किया जाएगा:

  1. स्टोन बाई स्टोन अनलोडिंग: मंदिर के पत्थरों को एक-एक करके (स्टोन बाई स्टोन) उतारा जाएगा और उन पर जमी काई (Algae) को साफ किया जाएगा.
  2. विशेष कोडिंग प्रणाली: पत्थरों को निकालते समय एक विशेष कोडिंग की जाएगी, ताकि यह रिकॉर्ड रहे कि कौन सा पत्थर किस स्थान से निकाला गया था.
  3. ग्राउंड स्टेबिलिटी एनालिसिस: पत्थरों के जमीनी स्थायित्व का गहन विश्लेषण किया जाएगा कि वे भविष्य में कितना लोड और दबाव झेल सकते हैं.
  4. पुनः स्थापना: विश्लेषण के बाद, सभी पत्थरों को पूरी सावधानी के साथ वापस उनके मूल स्थान पर व्यवस्थित किया जाएगा.
  5. मूल स्वरूप से कोई समझौता नहीं: इस पूरी प्रक्रिया के दौरान मंदिर की मूल वास्तुकला, धार्मिक महत्व और ऐतिहासिक स्वरूप को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया जाएगा.

CBRI की 5 वैज्ञानिकों की टीम कर रही है काम

संस्थान के निदेशक के अनुसार, अगस्त 2025 में इस परियोजना के लिए संपर्क किया गया था। वर्तमान में सीबीआरआई के पांच वैज्ञानिकों की एक विशेष टीम इस अभियान पर काम कर रही है:

  • टीम लीडर: डॉ. मनोजीत सामंता (Dr. Manojit Samanta)
  • अन्य सदस्य: डॉ. देवदत्ता घोष, डॉ. हिना गुप्ता, शशांक और श्रीनिवास.

तुंगनाथ मंदिर का पौराणिक और ऐतिहासिक महत्व

  • पांडवों द्वारा निर्माण: माना जाता है कि इस 1000 वर्ष पुराने नागार्जुन शैली के मंदिर का निर्माण पांडवों ने कराया था और यहीं पर भगवान शिव की पूजा की थी.
  • रावण की तपस्या: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, लंकापति रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए इसी स्थान पर कठिन तपस्या की थी.
  • श्री राम की आराधना: रावण के वध के बाद, भगवान राम ने स्वयं को ब्रह्म हत्या के श्राप से मुक्त करने के लिए इसी स्थान पर शिवजी की आराधना की थी.
  • पंच केदार: यह मंदिर उत्तराखंड के प्रसिद्ध ‘पंच केदारों’ में से एक है और वर्तमान में एएसआई के अंतर्गत संरक्षित है.

यात्रियों के लिए गाइड: कैसे पहुंचें तुंगनाथ?

मार्गसाधन और रूट विवरण
गढ़वाल मार्ग सेनजदीकी रेलवे स्टेशन ऋषिकेश और हवाई अड्डा जौलीग्रांट (देहरादून) है। यहाँ से बस या टैक्सी द्वारा उखीमठ होते हुए चोपता पहुंचें। चोपता से मंदिर के लिए 4 किलोमीटर की पैदल चढ़ाई है।
कुमाऊं मार्ग सेनजदीकी रेलवे स्टेशन रामनगर, हल्द्वानी या काठगोदाम हैं। रामनगर से गैरसैंण-कर्णप्रयाग होते हुए चोपता जा सकते हैं। हल्द्वानी/काठगोदाम से रोडवेज की बस या टैक्सी उपलब्ध हैं।
यात्रा का सही समयतुंगनाथ दर्शन के लिए मई से अक्टूबर तक का समय सबसे उपयुक्त माना जाता है। इसके बाद यहां भारी बर्फबारी होती है, जिससे रास्ते बंद हो जाते हैं।
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