'आधी मुस्कान' पूरी होगी, तभी सही मायनों में 'होली' होगी...

सुनीत द्विवेदी
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
आधी मुस्कान जैसा कुछ नहीं होता। या तो चेहरा खिलता है या फिर बुझ जाता है। अगर उत्सव में हर चेहरा शामिल नहीं, तो वह उत्सव कैसा?"
फागुन का महीना आ चुका है। प्रकृति ने अपना श्रृंगार शुरू कर दिया है। हरियाली ने लाल-पीले टेसू का आंचल ओढ़ लिया है। हवाओं में घुली सोंधी खुशबू होली के आने की मुनादी कर रही है। शहरों में बाजार सज गए हैं। मिठाइयों की खुशबू हवा में तैर रही है। लोग उत्सव को अंतिम रूप देने में जुटे हैं। लेकिन, क्या हमने कभी सोचा है कि जिस 'होली' को हम 'सबका त्यौहार' कहते हैं। क्या वह सच में सबके आंगन तक एक जैसी चमक लेकर पहुंचती है?
होली सबको एक ही रंग में रंगने का संदेश देती है। अगर इस बात पर हमारा अटूट विश्वास है, तो बाजारों की चकाचौंध से निकलकर एक फेरा नज़दीकी खेत-खलिहानों का भी लगाना चाहिए। वहां का दृश्य शायद आपकी खुशियों के रंग में थोड़ी संजीदगी घोल दे।
अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहे जाने वाले किसान, अपनी फसल रूपी 'अन्नपूर्णा' की संपत्ति कभी उसकी अपनी तिजोरी तक नहीं पहुंच पाती। वह तो बस उगाते हैं, ताकि दुनिया का पेट भर सके। विडंबना देखिए, आज के दौर में हम शहरी अपनी एक छोटी सी 'हूक' या मामूली सी उदासी को 'स्टेटस' बनाकर सोशल मीडिया पर डाल देते हैं और चंद मिनटों में सैकड़ों लाइक्स और सांत्वना भरे कमेंट्स बटोर लेते हैं। लेकिन देश का अन्नदाता, जिसकी पूरी साल की मेहनत मिट्टी में मिल जाती है। उसके पास अपना दुख बांटने के लिए कोई 'सोशल नेटवर्किंग साइट' नहीं है।
उसकी चीत्कारों को सुनने वाला कोई नहीं है। उसके ऊपर आसमान की बेरुखी है और नीचे धरती की असहायता। फागुन के आने से पहले ही कुदरत ने उसके चेहरे का गुलाल छीन लिया है, और हम? हम अपनी तरक्की की अंधी दौड़ में इतने मशगूल हैं कि हमें खबर तक नहीं।
हैरानी तो इस बात की है कि प्रकृति के इस असंतुलन के जिम्मेदार कहीं न कहीं हम शहरी ही हैं। पर्यावरण के साथ हमारी छेड़छाड़ और कंक्रीट के जंगलों की बढ़ती चाहत ने ही मौसम का मिजाज बिगाड़ा है। जिसका खामियाजा वह किसान भुगत रहा है, जिसने कभी किसी का बुरा नहीं चाहा।
वह अन्न उगाता है, तो हमारे घर भरते हैं। वह तपती धूप में जलता है। तब हमारे त्योहारों की थाली में पकवान सजते हैं। क्या हमारा यह फर्ज नहीं बनता कि जब उसके आंगन में अंधेरा हो, तो हम अपनी खुशियों का एक दीया वहां भी जलाएं?
होली का असली रंग गुलाल में नहीं, बल्कि किसी के आंसू पोंछने में है। इस बार होली पर, मिठाई और खुशियों का एक हिस्सा उन परिवारों के साथ बांटें जिन्होंने इस बार फसल नहीं, अपनी उम्मीदें खोई हैं। जब उस किसान के चेहरे पर मुस्कान की लाली लौटेगी, तभी समझना कि फागुन आया है। तभी वह 'आधी मुस्कान' पूरी होगी और तभी सही मायनों में 'होली' होगी।
