सनातन धर्म में एकादशी तिथि को महत्वपूर्ण माना गया है। इस व्रत को हर माह में 2 बार किया जाता है। वैदिक पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ माह में निर्जला एकादशी मनाई जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस एकादशी के व्रत को करने से साधक को सभी एकादशी व्रत का शुभ फल मिलता है। साथ ही सभी दुख दूर होते हैं। ऐसे में आइए जानते हैं कि निर्जला एकादशी की सही डेट और शुभ मुहूर्त के बारे में।
Nirjala Ekadashi 2025: भगवान विष्णु को समर्पित व्रतों में एकादशी का व्रत अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। सालभर में कुल 24 एकादशियां होती हैं, और यदि अधिकमास हो तो इनकी संख्या 26 तक पहुंच जाती है। प्रत्येक एकादशी का अपना विशिष्ट महत्व और उससे जुड़ी पौराणिक मान्यताएं हैं। इन्हीं में से एक है निर्जला एकादशी, जो हर साल ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि पर रखी जाती है।
जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, “निर्जला” का अर्थ है बिना जल के। इस एकादशी का व्रत कठोर नियमों वाला होता है, जिसमें व्रती को सूर्योदय से लेकर अगले दिन सूर्योदय (द्वादशी तिथि) तक जल की एक बूंद भी ग्रहण नहीं करनी होती। ज्येष्ठ माह की प्रचंड गर्मी में बिना पानी पिए रहना अत्यंत दुष्कर होता है, इसीलिए इस व्रत को सभी एकादशियों में सबसे कठिन माना जाता है। यही कारण है कि निर्जला एकादशी का व्रत अत्यधिक पुण्य फलदायी भी माना गया है।
आइए जानते हैं साल 2025 में निर्जला एकादशी कब है, इसका शुभ मुहूर्त क्या है और इस दिन किन वस्तुओं का दान करना विशेष फलदायी होता है।
निर्जला एकादशी 2025 तिथि :
हिंदू पंचांग के अनुसार, एकादशी तिथि की शुरुआत 6 जून को अर्धरात्रि में 2 बजकर 15 मिनट पर होगी और तिथि का समापन 7 जून को सुबह 4 बजकर 47 मिनट पर होगा. उदयातिथि के अनुसार, 6 जून को ही निर्जला एकादशी मनाई जाएगी.
पारण का समय- निर्जला एकादशी के पारण का समय 7 जून को दोपहर 1 बजकर 44 मिनट से लेकर शाम 4 बजकर 31 मिनट तक रहेगा.
निर्जला एकादशी का महत्व (Significance of Nirjala Ekadashi)
शास्त्रों के अनुसार, निर्जला एकादशी का व्रत करने से साल भर की सभी 24 एकादशियों के व्रत का फल प्राप्त होता है। इसे भीमसेनी एकादशी या पांडव एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार, महर्षि वेदव्यास ने पांडवों को सभी एकादशियों का व्रत करने का सुझाव दिया था। लेकिन भीमसेन, जिन्हें अत्यधिक भूख लगती थी, उनके लिए हर माह दो बार निराहार रहना संभव नहीं था। तब महर्षि वेदव्यास ने उन्हें ज्येष्ठ माह की शुक्ल पक्ष की इस एक एकादशी का व्रत निर्जल रहकर करने की सलाह दी, जिससे उन्हें बाकी सभी एकादशियों का पुण्य फल मिल सके। भीमसेन ने इस व्रत का पालन किया, इसीलिए यह भीमसेनी एकादशी कहलाई।
माना जाता है कि इस व्रत को श्रद्धापूर्वक करने से सभी पापों का नाश होता है, सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है और अंत में मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है।
निर्जला एकादशी व्रत विधि (Nirjala Ekadashi Vrat Vidhi)
निर्जला एकादशी पर दान का महत्व
ज्येष्ठ माह की भीषण गर्मी में किए जाने वाले इस व्रत में जल का त्याग मुख्य होता है, इसलिए इस दिन जल और शीतलता प्रदान करने वाली वस्तुओं का दान करना अत्यधिक शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन किए गए दान का पुण्य कई गुना अधिक मिलता है।
इन वस्तुओं का करें दान:
इस प्रकार श्रद्धा और भक्तिभाव से निर्जला एकादशी का व्रत करने और दान-पुण्य करने से भगवान विष्णु की असीम कृपा प्राप्त होती है और जीवन में सुख-शांति बनी रहती है।
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. tv10 india इसकी पुष्टि नहीं करता है.)
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