
खास बातें:
- बजट जारी: सेब की अतिसघन बागवानी (Ultra-High-Density Farming) को बढ़ावा देने के लिए जिलों को 17 करोड़ 52 लाख रुपये की पहली किस्त जारी की गई है। योजना के लिए कुल 34 करोड़ रुपये स्वीकृत हैं।
- बड़ा लक्ष्य: इस वित्तीय वर्ष (2026-2027) में 500 हेक्टेयर और वर्ष 2030 तक कुल 5,000 हेक्टेयर में सेब के नए बाग विकसित करने की योजना है।
- उन्नत प्रजातियां: बागों में किंग रोट, मेमा मास्टर, जेड वेन और हैपेक जैसी उन्नत किस्मों के पौधे लगाए जा रहे हैं, जिनसे 3 से 4 साल में व्यावसायिक उत्पादन शुरू हो जाएगा।
देहरादून: उत्तराखंड में सेब के उत्पादन को दोगुना करने और अतिसघन बागवानी को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने ‘एप्पल मिशन’ के तहत जिलों को 17 करोड़ 52 लाख रुपये की पहली किस्त जारी कर दी है। इस योजना के लिए कुल 34 करोड़ रुपये का बजट स्वीकृत किया गया है। सरकार का लक्ष्य चालू वर्ष 2026-2027 में प्रदेश के 500 हेक्टेयर क्षेत्र में सेब के नए बाग विकसित करने का है।
वर्ष 2030 तक 5 हजार हेक्टेयर में बाग विकसित करने का लक्ष्य
वर्तमान में उत्तराखंड में लगभग 12,000 हेक्टेयर क्षेत्रफल में सेब के बाग हैं, जिनसे सालाना करीब 44,000 मीट्रिक टन सेब का उत्पादन होता है। सेब के उत्पादन और गुणवत्ता को और अधिक बेहतर बनाने के लिए विभाग लगातार प्रयास कर रहा है। इसी के तहत वर्ष 2030 तक राज्य में अतिरिक्त 5,000 हेक्टेयर क्षेत्र में आधुनिक तकनीक आधारित सेब के नए बाग विकसित करने का दीर्घकालिक लक्ष्य रखा गया है।
किसानों को मिलेगी 80 प्रतिशत की भारी सब्सिडी
एप्पल मिशन के तहत सेब के बाग लगाने वाले किसानों को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार की ओर से 80 प्रतिशत की भारी सब्सिडी प्रदान की जा रही है। उद्यान विभाग के प्रभारी अपर निदेशक रतन कुमार ने बताया कि इस योजना के तहत कम क्षेत्रफल वाले खेतों में भी अधिक से अधिक पौधे लगाकर सघन बागवानी को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसके लिए किंग रोट, मेमा मास्टर, जेड वेन और हैपेक जैसी सेब की उच्च गुणवत्ता वाली आधुनिक प्रजातियों का चयन किया गया है।
क्लस्टर आधारित खेती से मिलेगा मार्केटिंग का लाभ
विभाग के अनुसार, इन उन्नत प्रजातियों के रोपण से महज तीन से चार साल के भीतर सेब का व्यावसायिक उत्पादन शुरू हो जाएगा, जिससे किसानों को जल्द लाभ मिलना शुरू होगा। इसके अतिरिक्त, इस योजना को ‘क्लस्टर’ (एक ही क्षेत्र में बड़े पैमाने पर खेती) के रूप में विकसित किया जा रहा है। क्लस्टर आधारित उत्पादन होने से किसानों को स्थानीय स्तर पर बेहतर विपणन (मार्केटिंग) और परिवहन की सुविधाएं मिल सकेंगी, जिससे उन्हें उनके उत्पाद का सही मूल्य मिल पाएगा।
