UTTARAKHAND

उत्तराखंड: चारधाम यात्रा से पहले ‘रावल’ विवाद गहराया; बदरीनाथ में ब्रह्मचर्य और केदारनाथ में नियुक्ति पर उठे सवाल

देहरादून: उत्तराखंड में चारधाम यात्रा 2026 के आगाज से ठीक पहले बदरीनाथ और केदारनाथ धाम के मुख्य पुजारियों (रावल) को लेकर विवादों ने तूल पकड़ लिया है। एक ओर बदरीनाथ के पूर्व रावल की शादी पर धार्मिक हलकों में बहस छिड़ी है, तो दूसरी ओर केदारनाथ में रावल की नियुक्ति प्रक्रिया पर सवाल खड़े हुए हैं। इन विवादों के बीच बदरी-केदार मंदिर समिति (BKTC) के सीईओ को हटाए जाने के बाद प्रशासनिक चुनौतियां भी बढ़ गई हैं।

बदरीनाथ: ब्रह्मचर्य बनाम निजी जीवन का विवाद

बदरीनाथ धाम के पूर्व रावल का विवाह समारोह का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद धर्म के जानकारों और मंदिर समिति के बीच मतभेद सामने आए हैं।

  • धर्माधिकारियों का तर्क: धर्माधिकारी जगदंबा प्रसाद सती के अनुसार, बदरीनाथ के रावल ‘नैष्ठिक ब्रह्मचारी’ होते हैं। गृहस्थ आश्रम में लौटना धार्मिक नियमों के विरुद्ध और पद की मर्यादा के विपरीत है।
  • 1939 का एक्ट: डिमरी धार्मिक केंद्रीय पंचायत के अध्यक्ष आशुतोष डिमरी का कहना है कि 1939 के एक्ट के तहत रावल के लिए आजीवन ब्रह्मचर्य का प्रावधान है, चाहे वे पद से त्यागपत्र क्यों न दे दें।
  • समिति का पक्ष: BKTC अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी का कहना है कि ब्रह्मचर्य की बाध्यता केवल ‘कार्यकाल’ तक है। पद छोड़ने के बाद रावल निजी जीवन जीने के लिए स्वतंत्र हैं। खुद पूर्व रावल ईश्वर प्रसाद नंबूदरी ने भी इसे अपनी निजी स्वतंत्रता बताया है।

केदारनाथ: बिना अनुमति उत्तराधिकारी की घोषणा?

केदारनाथ धाम में रावल की नियुक्ति और उत्तराधिकारी तय करने के मामले में समिति ने सख्त रुख अपना लिया है।

  • क्या है विवाद: केदारनाथ के निवर्तमान रावल भीमाशंकर लिंग ने नांदेड़ में पट्टाभिषेक कर अपने उत्तराधिकारी की घोषणा की है। BKTC ने इसे नियमों का उल्लंघन माना है।
  • नोटिस जारी: BKTC अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी ने स्पष्ट किया है कि रावल की नियुक्ति का अधिकार केवल समिति के पास है। किसी भी प्रकार की नियुक्ति का प्रस्ताव समिति को नहीं मिला है, इसलिए समिति ने निवर्तमान रावल को नोटिस भेजकर जवाब मांगा है।

क्यों खास है रावल की नियुक्ति?

आदि गुरु शंकराचार्य ने सदियों पहले इन धामों में दक्षिण भारतीय ब्राह्मणों को रावल के रूप में स्थापित कर उत्तर और दक्षिण की संस्कृति को जोड़ा था।

  • बदरीनाथ: यहाँ केरल के नंबूदरी ब्राह्मण रावल बनते हैं, जो स्वयं भगवान की पूजा करते हैं।
  • केदारनाथ: यहाँ कर्नाटक के वीरशैव/लिंगायत परंपरा के ब्राह्मण रावल होते हैं, जो अनुष्ठानों की निगरानी करते हैं।

यात्रा पर पड़ेगा असर?

19 अप्रैल से गंगोत्री के कपाट खुलने के साथ ही चारधाम यात्रा शुरू हो रही है। ठीक इसी समय BKTC के सीईओ विजय थपलियाल की प्रतिनियुक्ति समाप्त कर उन्हें मूल विभाग भेज दिया गया है। ऐसे में यात्रा के प्रबंधन और विवादों के समाधान के लिए एक अनुभवी अधिकारी की नियुक्ति समिति के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है।

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