UTTARAKHAND

उत्तराखंड आपदा के मुहाने पर: 10 साल में खतरनाक रूप से बढ़ीं ग्लेशियर झीलें, वैज्ञानिकों ने दी चेतावनी

देहरादून: उत्तराखंड में मानसून की विनाशकारी घटनाओं के बीच, वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान और दून विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों के एक ताजा शोध ने भविष्य के लिए खतरे की घंटी बजा दी है। मई में प्रकाशित इस शोध के अनुसार, पिछले एक दशक में उत्तराखंड में न केवल ग्लेशियर झीलों की संख्या में वृद्धि हुई है, बल्कि उनके क्षेत्रफल में भी खतरनाक रूप से इजाफा हुआ है। यह अध्ययन राज्य के आपदाओं के मुहाने पर होने का स्पष्ट संकेत देता है, जिसका मुख्य कारण ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना है।

हाई-रिजॉल्यूशन सैटेलाइट डेटा का उपयोग करते हुए किए गए इस अध्ययन से पता चलता है कि 2013 में जहां प्रदेश में 1266 ग्लेशियर झीलें थीं, वहीं 2023 में यह संख्या बढ़कर 1290 हो गई है। यह दो प्रतिशत की वृद्धि है। इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि इन झीलों का कुल क्षेत्रफल इसी अवधि में 75.9 लाख वर्ग मीटर से आठ प्रतिशत बढ़कर 82.1 लाख वर्ग मीटर हो गया है।

मोरेन-डैम झीलें बनीं सबसे बड़ा खतरा

वैज्ञानिकों ने विशेष रूप से मोरेन-डैम झीलों को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की है। ये झीलें ग्लेशियर द्वारा लाए गए मिट्टी और पत्थरों के मलबे (मोरेन) से बनती हैं, जिनके किनारे कमजोर होते हैं। पिछले 10 वर्षों में ऐसी झीलों की संख्या में 19.2 प्रतिशत और उनके क्षेत्रफल में 20.4 प्रतिशत की भारी वृद्धि दर्ज की गई है।यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि बर्फ और ग्लेशियर पहले की तुलना में कहीं अधिक तेजी से पिघल रहे हैं। उत्तराखंड की कुल ग्लेशियर झीलों में से 58 प्रतिशत हिस्सा इन्हीं खतरनाक मोरेन-डैम झीलों का है।

बड़ी झीलों का निर्माण और बढ़ता जोखिम

शोध में एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया है। ग्लेशियर की सतह पर बनने वाली सुप्राग्लेशियल झीलों की संख्या 2013 में 809 से घटकर 2023 में 685 रह गई है। हालांकि, यह राहत की बात नहीं है, क्योंकि कई छोटी-छोटी झीलें आपस में मिलकर बड़ी और अधिक खतरनाक झीलों का निर्माण कर रही हैं। 2023 में इन झीलों में से 62 प्रतिशत का क्षेत्रफल 800 वर्ग मीटर से अधिक था। ये झीलें ज्यादातर 4500 मीटर से अधिक की ऊंचाई पर स्थित हैं, जहां पहुंचना और निगरानी करना मुश्किल है।

चमोली और उत्तरकाशी सर्वाधिक संवेदनशील

अध्ययन के अनुसार, ग्लेशियर झीलों का सबसे अधिक जमाव चमोली (571) और उत्तरकाशी (430) जिलों में है। पिथौरागढ़ में 228, टिहरी में 32 और रुद्रप्रयाग में 22 झीलें हैं। इसका सीधा मतलब है कि इन जिलों में ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) यानी हिमनद झीलों के फटने का खतरा सबसे अधिक है। ऐसी किसी भी घटना से स्थानीय निवासियों, सड़कों, पुलों और महत्वपूर्ण जल विद्युत परियोजनाओं को भारी नुकसान हो सकता है।

नदी बेसिन में भी झीलों का विस्तार

नदी बेसिन2013 में झीलें2023 में झीलेंप्रतिशत बढ़ोतरी
अलकनंदा635580-8.7%
भागीरथी30634111.4%
भिलंगना222931.8%
धौलीगंगा75750%
गोरीगंगा92931.1%
कुथियांगति455113.3%
मंदाकिनी192426.3%
पिंडर770%
टोंस527340.4%
यमुना131730.8%

स्रोत: वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान और दून विश्वविद्यालय शोध पत्र

टोंस, भिलंगना, यमुना और मंदाकिनी नदी बेसिन में झीलों की संख्या में सबसे अधिक वृद्धि देखी गई है, जो इन घाटियों में भविष्य के खतरों की ओर इशारा करता है।

हिमाचल की तुलना में उत्तराखंड अधिक संवेदनशील

शोध में यह भी बताया गया है कि हिमाचल प्रदेश में अधिक ग्लेशियर होने के बावजूद, उत्तराखंड में सुप्राग्लेशियल झीलों की संख्या (685) हिमाचल (228) की तुलना में लगभग तीन गुना है। वैज्ञानिकों का मानना है कि उत्तराखंड में तेज मानसूनी बारिश, कम अक्षांश और ग्लेशियरों का अपेक्षाकृत नीचा होना, उनके पिघलने की रफ्तार को बढ़ा रहा है, जिससे राज्य अधिक संवेदनशील हो जाता है।

यह शोधपत्र, जिसे शर्मिष्ठा हलदर, सौम्या सत्यप्राज्ञान, उज्ज्वल कुमार, दीप्ति एस, और राकेश भांबरी ने तैयार किया है, राज्य सरकार और आपदा प्रबंधन एजेंसियों के लिए एक गंभीर चेतावनी है। 2013 में केदारनाथ और 2021 में चमोली में हुई त्रासदियां ग्लेशियर झीलों के फटने के विनाशकारी परिणामों का प्रमाण हैं। इन नए आंकड़ों के आलोक में, संवेदनशील झीलों की तत्काल और निरंतर निगरानी तथा एक मजबूत पूर्व चेतावनी प्रणाली विकसित करना अत्यंत आवश्यक हो गया है।

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