देहरादून: उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्रों में पिछले एक दशक में ग्लेशियर झीलों की संख्या और उनके क्षेत्रफल में चिंताजनक वृद्धि दर्ज की गई है। एक ताजा अध्ययन से यह चौंकाने वाला सच सामने आया है, जो भविष्य में विनाशकारी बाढ़ के बढ़ते खतरे की ओर इशारा करता है। जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने को इस खतरनाक बदलाव का मुख्य कारण माना जा रहा है।
केंद्रीय जल आयोग (CWC) द्वारा 2011 से सितंबर 2024 तक किए गए एक अध्ययन के अनुसार, हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर झीलों के क्षेत्रफल में 33.7 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। चिंता की बात यह है कि उत्तराखंड समेत पांच राज्यों में कुछ ग्लेशियर झीलों का आकार 40 प्रतिशत से भी अधिक बढ़ गया है।इस रिपोर्ट में 67 ऐसी झीलों की पहचान की गई है, जिनके सतही क्षेत्रफल में 40 प्रतिशत से ज्यादा की बढ़ोतरी देखी गई है।
एक अन्य अध्ययन, जिसका उल्लेख वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान ने किया है, के अनुसार उत्तराखंड हिमालय में 2015 के बाद से ग्लेशियर झीलों की संख्या 1266 से बढ़कर 1290 हो गई है और उनके दायरे में 8.1 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। वहीं, कुमाऊं हिमालय के गोरी गंगा वाटरशेड पर केंद्रित एक शोध में 1990 से 2020 के बीच 77 नई ग्लेशियर झीलों के बनने का पता चला है।
बढ़ता खतरा और सरकार की तैयारी
इन झीलों का बढ़ता आकार ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) यानी हिमनद झीलों के फटने से आने वाली बाढ़ के खतरे को कई गुना बढ़ा देता है। इस तरह की घटनाएं निचले इलाकों में भारी तबाही मचा सकती हैं, जैसा कि 2013 में केदारनाथ और 2021 में चमोली में देखा गया था।
इस बढ़ते खतरे को देखते हुए सरकार ने उत्तराखंड में 13 ग्लेशियर झीलों को खतरनाक या संवेदनशील के रूप में चिह्नित किया है। इनमें से पांच झीलें “अत्यधिक संवेदनशील” श्रेणी में रखी गई हैं, जिन पर विशेष निगरानी की जा रही है। इन उच्च जोखिम वाली झीलों के मूल्यांकन और सर्वेक्षण के लिए विशेषज्ञों की टीमें गठित की गई हैं जो इनके फटने के संभावित खतरे का आकलन करेंगी।
विशेषज्ञों का कहना है कि मोरेन (ग्लेशियर द्वारा लाए गए मलबे) से बनी झीलें सबसे खतरनाक होती हैं, क्योंकि उनकी दीवारें कमजोर होती हैं। तापमान में वृद्धि और ग्लेशियरों के लगातार पिघलने से इन झीलों में पानी की मात्रा बढ़ रही है, जिससे इन कमजोर दीवारों पर दबाव बढ़ रहा है। यह स्थिति भविष्य के लिए एक गंभीर चेतावनी है, जिस पर तत्काल ध्यान देने और प्रभावी आपदा प्रबंधन रणनीतियों को लागू करने की आवश्यकता है।
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