देहरादून। उत्तराखंड के राजकीय मेडिकल कॉलेजों से एमबीबीएस पास करने वाले डॉक्टरों के लिए स्वास्थ्य विभाग बड़ा नियम लागू करने जा रहा है। प्रदेश के सरकारी अस्पतालों, विशेषकर पर्वतीय क्षेत्रों में डॉक्टरों की भारी कमी को दूर करने के लिए विभाग ने एक नई नीति तैयार की है। इसके तहत एमबीबीएस डॉक्टरों को पोस्ट ग्रेजुएशन (PG) में दाखिले के लिए आवेदन करने से पहले कम से कम 3 साल तक अनिवार्य रूप से सरकारी सेवाएं देनी होंगी।
स्वास्थ्य विभाग ने इस नीति का प्रस्ताव तैयार कर शासन को भेज दिया है। माना जा रहा है कि मंत्रिमंडल (कैबिनेट) की आगामी बैठक में इस प्रस्ताव को मंजूरी के लिए रखा जाएगा, जहाँ से हरी झंडी मिलते ही इसे प्रदेश भर में लागू कर दिया जाएगा।
उत्तराखंड में हर साल बड़ी संख्या में डॉक्टर एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी करते हैं। राजकीय मेडिकल कॉलेजों में रियायती दरों पर पढ़ाई करने के कारण डॉक्टरों पर बॉन्ड के तहत सरकारी सेवा देने की बाध्यता होती है।
हालांकि, देखा गया है कि डॉक्टर पहाड़ों में जॉइनिंग तो ले लेते हैं, लेकिन कुछ ही दिनों या हफ्तों के भीतर उच्च शिक्षा (PG) के लिए आवेदन कर देते हैं। पीजी में चयन होने पर सरकार उन्हें पढ़ाई की अनुमति दे देती है, जिसके दौरान उन्हें आधा वेतन भी मिलता रहता है। कागजों पर तो वे अस्पताल में तैनात दिखते हैं, लेकिन धरातल पर पद खाली रहते हैं। इस वजह से पर्वतीय जिलों में स्वास्थ्य सेवाएं लगातार प्रभावित होती आ रही हैं।
नई नीति के तहत, यदि कोई एमबीबीएस डॉक्टर स्वास्थ्य विभाग में जॉइनिंग लेता है, तो उसे न्यूनतम 3 साल तक सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों या अस्पतालों में काम करना होगा। यह 3 साल की अनिवार्य सेवा पूरी करने के बाद ही विभाग उन्हें पीजी में प्रवेश या आवेदन के लिए अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) देगा।
“डॉक्टरों की कमी दूर करने के लिए उठाया गया कदम”“राजकीय मेडिकल कॉलेजों से पास आउट एमबीबीएस डॉक्टर जब स्वास्थ्य विभाग में जॉइनिंग करते हैं, तो वे कुछ ही दिनों तक सेवाएं देने के बाद पोस्ट ग्रेजुएशन के लिए आवेदन कर देते हैं। ऐसे में उन्हें परमिशन देनी पड़ती है, जिससे अस्पतालों में एमबीबीएस डॉक्टरों की कमी हो जाती है। लिहाजा जो पॉलिसी तैयार की गई है, उसके अनुसार जॉइनिंग करने वाले डॉक्टरों को कम से कम 3 साल तक अपनी सेवाएं देनी होंगी। उसके बाद ही उन्हें पीजी के लिए अनुमति दी जाएगी। इस प्रस्ताव को कैबिनेट के सम्मुख रखा जाएगा।”— डॉ. सुनीता टम्टा, स्वास्थ्य महानिदेशक (उत्तराखंड)
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