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पहाड़ों पर पलायन का नया ‘विलेन’: उत्तराखंड में रोजगार नहीं, बंदर छुड़वा रहे गांव; 37% खेती बर्बाद, 2 साल में 214 लोगों पर किया जानलेवा हमला

देहरादून।
उत्तराखंड के पहाड़ों से पलायन (Migration) के लिए अब तक बदहाल स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क और रोजगार को जिम्मेदार माना जाता था। लेकिन अब एक नया और खौफनाक कारण सामने आया है- ‘बंदरों और लंगूरों का आतंक’। देवभूमि के पहाड़ों पर बंदर सिर्फ फसलें ही बर्बाद नहीं कर रहे, बल्कि इंसानों पर जानलेवा हमले भी कर रहे हैं। डर और भारी नुकसान के कारण ग्रामीण अपने पुश्तैनी गांव और खेती पूरी तरह छोड़ने को मजबूर हो गए हैं।

खबर की 3 अहम बातें:

  1. खेती बर्बाद: पलायन आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, पहाड़ों पर 37% फसलें सिर्फ बंदर तबाह कर रहे हैं। खेती घाटे का सौदा बन गई है।
  2. हमले बढ़े: 2024 और 2025 के आंकड़े डराने वाले हैं। इन 2 सालों में बंदर-लंगूरों ने 214 लोगों पर जानलेवा हमला कर घायल किया है।
  3. नसबंदी अभियान फेल? वन विभाग ने 1 लाख बंदरों की नसबंदी का दावा किया (प्रति बंदर ₹1500 खर्च), लेकिन जमीन पर ग्रामीणों को कोई राहत नहीं है।

खेत हो रहे बंजर, खेती बनी घाटे का सौदा
उत्तराखंड के पर्वतीय गांवों में किसान छोटी-छोटी जोत (खेतों) पर खेती कर गुजारा करते हैं। लेकिन अब हालात ऐसे हैं कि लोग खेतों में बीज बोने से ही डरने लगे हैं। महीनों की मेहनत को बंदरों का झुंड कुछ ही घंटों में बर्बाद कर देता है। उत्तराखंड पलायन आयोग की विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार, राज्य में लगभग 37 प्रतिशत फसलों के खराब होने की सबसे बड़ी वजह बंदर ही हैं। लगातार हो रहे इस नुकसान की वजह से खेत बंजर हो रहे हैं और लोग आजीविका की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं।

इंसानों पर हमले: 11 साल में 7 केस, पिछले 2 साल में 214 घायल
वन विभाग के पुराने रिकॉर्ड्स पर नजर डालें तो 2013 से 2023 (11 साल) के बीच बंदरों के हमले के मात्र 7 मामले दर्ज थे। लेकिन जब 2024 से व्यवस्थित डेटा रखा जाने लगा, तो असलियत सामने आ गई।

  • साल 2024: 102 लोगों पर बंदरों और लंगूरों ने हमला किया।
  • साल 2025: हमले के 112 मामले सामने आए।
    बंदर अब इतने आक्रामक हो चुके हैं कि खेतों में काम करने वाली महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों पर सीधे हमला कर रहे हैं। घरों में घुसकर राशन उठा ले जाना आम बात हो गई है।

नसबंदी पर करोड़ों खर्च, फिर भी हालात जस के तस
वन विभाग का दावा है कि 2021 में बंदरों और लंगूरों की संख्या नियंत्रित करने के लिए बड़े स्तर पर नसबंदी अभियान चलाया गया था। इसमें 1 लाख बंदरों और 22 हजार लंगूरों की नसबंदी की गई। एक बंदर की नसबंदी पर 1500 रुपए से ज्यादा का खर्च आया। लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि इतने बड़े खर्च के बावजूद पहाड़ों पर बंदरों की संख्या कम होने के बजाय बढ़ी हुई ही महसूस हो रही है। जंगलों में फलदार पेड़ों (प्राकृतिक भोजन) की कमी के चलते ये झुंड गांवों की तरफ आ रहे हैं।

क्या कह रहे हैं सरकार के जिम्मेदार?

  • “विभाग, वन विभाग और अन्य एजेंसियों के साथ मिलकर समाधान तलाशने में जुटा है। हम खेतों के चारों ओर फेंसिंग (तारबाड़) लगाने जैसे उपायों पर काम कर रहे हैं, ताकि फसलों को बचाया जा सके। हालांकि, ग्रामीणों को भी सामूहिक निगरानी जैसे कदम उठाने होंगे।”
    – धीराज गर्ब्याल, सचिव, ग्रामीण विकास विभाग
  • “बंदरों की समस्या को लेकर पहले भी अभियान चलाए गए, जिसका असर दिखा है। वन विभाग लगातार प्रयास कर रहा है, आने वाले समय में इसके बेहतर परिणाम दिखेंगे। किसानों के नुकसान को कम करने के लिए कुछ अतिरिक्त प्रयासों की जरूरत है।”
    – सुबोध उनियाल, वन मंत्री, उत्तराखंड

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