मुख्य बिंदु:
देहरादून: समान नागरिक संहिता (UCC), सख्त धर्मांतरण कानून और मदरसा बोर्ड को भंग करने जैसे बड़े फैसलों के बाद अब उत्तराखंड में ‘जनसंख्या नियंत्रण कानून’ (Population Control Law) को लेकर बहस तेज हो गई है। आगामी चुनावों से ठीक पहले भाजपा के भीतर से ही इस कानून को लाने की मांग उठने लगी है, जिसने प्रदेश के सियासी पारे को गरमा दिया है।
इस चर्चा को तब बल मिला जब रुद्रपुर से भाजपा विधायक शिव अरोड़ा ने 12 मार्च 2026 को गैरसैंण सत्र के दौरान सदन में इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया। माना जा रहा है कि विधानसभा के भीतर इस तरह की मांग उठना महज इत्तेफाक नहीं है, बल्कि यह सरकार की भविष्य की रणनीति का हिस्सा हो सकता है।
विधायक शिव अरोड़ा ने जनसंख्या के बदलते आंकड़ों का हवाला देते हुए इस कानून की जरूरत बताई। उनके मुख्य तर्क इस प्रकार हैं:
इस संवेदनशील मुद्दे पर उत्तराखंड के अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री खजान दास का कहना है कि भाजपा ‘सबका साथ सबका विकास’ के सिद्धांत पर काम करती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जनसंख्या नियंत्रण कानून पर कोई भी अंतिम फैसला मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की अध्यक्षता में सामूहिक विचार-विमर्श के बाद ही लिया जाएगा।
दूसरी ओर, कांग्रेस ने इस मुद्दे को लेकर सरकार की घेराबंदी शुरू कर दी है। कांग्रेस प्रदेश प्रवक्ता शीशपाल बिष्ट ने आरोप लगाया कि जब भी चुनाव नजदीक आते हैं, भाजपा ध्रुवीकरण के लिए इस तरह के मुद्दे उछालती है। कांग्रेस का मानना है कि भाजपा विकास के बजाय सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़कर वोट बैंक की राजनीति कर रही है।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में उत्तराखंड सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में कई कड़े फैसले लिए हैं:
इन फैसलों ने जहां धामी सरकार की छवि को एक सशक्त हिंदूवादी नेतृत्व के रूप में स्थापित किया है, वहीं अब जनसंख्या नियंत्रण कानून की सुगबुगाहट ने प्रदेश में नई राजनीतिक बहस को जन्म दे दिया है। देखना होगा कि क्या उत्तराखंड चुनाव से पहले इस दिशा में कोई ठोस कदम उठाता है।
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