चोपता (रुद्रप्रयाग):
उत्तराखंड के गढ़वाल हिमालय में स्थित ‘तृतीय केदार’ भगवान तुंगनाथ का पवित्र धाम और मखमली घास के मैदानों से सजी चोपता की खूबसूरत घाटी प्रकृति प्रेमियों और श्रद्धालुओं के लिए स्वर्ग मानी जाती है। लेकिन, भारी संख्या में पर्यटकों के आने (ओवर-टूरिज्म), लापरवाही और अनियंत्रित प्लास्टिक कचरे ने अब इस संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र की सांसें फुला दी हैं। चोपता के मखमली बुग्यालों पर बिखरी बियर की बोतलें, चिप्स के पैकेट और अस्थायी शौचालयों से रिसता गंदा पानी यहाँ के नाजुक पर्यावरण को तबाह कर रहा है।
तुंगनाथ धाम के तीर्थ पुरोहित रेवाधर मैथानी बताते हैं कि घाटी का दौरा करने वाले कई सैलानी तय रास्तों (ट्रैक) को छोड़कर सीधे घास के मैदानों (बुग्यालों) पर चलते हैं। इस कारण यहां की मुलायम घास नष्ट हो रही है और मिट्टी का कटाव (सॉइल इरोजन) बढ़ रहा है।
चोपता वन्यजीव अभयारण्य का हिस्सा होने के कारण यह क्षेत्र थार, रेड फॉक्स और हिमालयन मोनाल जैसी कई दुर्लभ प्रजातियों का घर है। लेकिन पर्यटकों की अनियंत्रित भीड़ का समय अक्सर इन वन्यजीवों और पक्षियों के प्रजनन काल (ब्रीडिंग सीजन) से मेल खाता है, जिससे उनके प्राकृतिक चक्र में गंभीर बाधा आ रही है।
घास के मैदानों में चाय की दुकानों और टेंटों के पास भारी मात्रा में कचरा बिखरा रहता है। तेज़ हवाओं के कारण यह प्लास्टिक बुग्यालों में फैल जाता है, जिससे मिट्टी के पोषक तत्व प्रभावित हो रहे हैं। इसके अलावा, यहाँ बढ़ रहे ‘बियर बोतल टूरिज्म’ ने वन्यजीवों की आवाजाही को सीमित कर दिया है।
कचरा डंपिंग साइटों के पास अब अक्सर हिरणों के झुंड मंडराते देखे जा सकते हैं। वन्यजीव फोटोग्राफर राजू पुसोला ने बताया कि उन्होंने एक बार एक मोनाल पक्षी को बिखरे हुए पैकेटों से कुरकुरे खाते देखा था। पैकेज्ड फूड में मौजूद हानिकारक तत्व इन जंगली पक्षियों की प्रजनन क्षमता और पाचन तंत्र को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचा रहे हैं।
स्थानीय लोगों के अनुसार, पर्यटन बढ़ने के साथ ही इस इलाके में बंदरों की आबादी अप्रत्याशित रूप से बढ़ गई है। पहले इस ऊंचाई वाले क्षेत्र में केवल लंगूर पाए जाते थे, लेकिन अब पर्यटकों द्वारा छोड़े गए जूठे भोजन के लालच में बंदरों ने डेरा जमा लिया है। ये बंदर मोनाल और तीतर जैसे जमीन और झाड़ियों में घोंसला बनाने वाले पक्षियों के अंडों तथा घोंसलों को नष्ट कर रहे हैं।
हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय (HNBGU) के प्रोफेसर आनंद कुमार और राजीव लोचन द्वारा तुंगनाथ व मदमहेश्वर में किए गए एक शोध में हैरान करने वाले तथ्य सामने आए हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार, चोपता घाटी में पर्यटकों के शोर, गाड़ियों के हॉर्न और आसमान में उड़ने वाले हेलीकॉप्टरों की आवाजाही से पक्षियों के आपसी संवाद (Communication) में भारी बाधा आ रही है।
मोनाल पक्षी साथी को आकर्षित करने और खतरे की चेतावनी देने के लिए आवाज़ निकालते हैं। अत्यधिक शोर के कारण उन्हें अपनी आवाज़ को सामान्य से अधिक तेज़ करना पड़ रहा है, जिसका सीधा असर उनकी शारीरिक क्षमता और सेहत पर पड़ रहा है। इस तनाव के कारण उनके अंडे देने और उन्हें सेने (इन्क्यूबेशन) का समय गड़बड़ा रहा है, जिससे अंडों से चूजों के सुरक्षित बाहर आने और जीवित रहने की दर घट रही है।
पर्यटन के बढ़ते दबाव के बीच ग्लोबल वार्मिंग (जलवायु परिवर्तन) की मार भी इस क्षेत्र पर साफ दिख रही है। तापमान बढ़ने और ग्लेशियरों के पीछे हटने के कारण बुग्याल और पेड़ों की प्राकृतिक सीमाएं (ट्री-लाइन) अधिक ऊंचाई की ओर खिसक रही हैं। पर्यावरणविदों का मानना है कि यदि जल्द ही चोपता-तुंगनाथ क्षेत्र में पर्यटकों की संख्या नियंत्रित करने और इको-टूरिज्म के कड़े नियम लागू नहीं किए गए, तो इस देवभूमि की अद्वितीय जैव-विविधता सदा के लिए नष्ट हो जाएगी।
इस गंभीर पर्यावरणीय संकट पर पद्मश्री से सम्मानित वरिष्ठ पर्यावरणविद डॉ. अनिल प्रकाश जोशी ने चिंता व्यक्त की है. उनका कहना है:
“हमें एक ऐसी सख्त नियंत्रण प्रणाली (Control System) विकसित करनी होगी, जिसमें सैलानी ट्रेक रूट पर प्लास्टिक ले ही न सकें. अगर वे ट्रेक पर जाएंगे तो निश्चित ही कचरा वहीं फेंकेंगे. पर्यटकों को ट्रेक शुरू होने से पहले ही केवल जरूरत का न्यूनतम सामान दिया जाना चाहिए और वापस लौटने पर उसकी चेकिंग होनी चाहिए. जब तक पर्यटकों में पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी और स्थानीय लोगों की भागीदारी सुनिश्चित नहीं होगी, तब तक इन बुग्यालों को नहीं बचाया जा सकेगा.”
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