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वरुथिनी एकादशी 2024: सभी कष्ट और दुख दूर करता है यह व्रत

वरुथिनी एकादशी के दिन लोग भगवान विष्णु के वामन अवतार की पूजा करते हैं और ऐसा माना जाता है कि इस एकादशी पर व्रत रखने से लोग किसी भी प्रकार की बुरी ऊर्जा और नकारात्मकता से सुरक्षित रहते हैं.

नई दिल्ली:वरूथिनी एकादशी हिन्दू धर्म में एक महत्वपूर्ण व्रत है जो वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन, भक्त विशेष रूप से भगवान विष्णु की पूजा करते हैं और विभिन्न प्रकार के नियमों का पालन करते हैं। इस व्रत को करने से माना जाता है कि व्यक्ति के सभी पापों का नाश होता है और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।

वरूथिनी एकादशी के व्रत में भक्तों को कुछ विशेष चीजों का त्याग करना होता है, जैसे कि दशमी के दिन काँसे के पात्र, उडद, मसूर, चना, कोदो, शाक, शहद, दूसरे का अन्न, दो बार भोजन तथा रति का त्याग करना होता है। एकादशी के दिन जुआ खेलना, सोना, पान खाना, दातून करना, परनिन्दा, चुगली, चोरी, हिंसा, रति, क्रोध तथा असत्य भाषण- इन ग्यारह बातों का परित्याग करना होता है।

इस व्रत की रात्रि में जागरण करके भगवान मधुसूदन का पूजन करने से व्यक्ति सब पापों से मुक्त होकर परमगति को प्राप्त होता है। यह व्रत सभी को भोग और मोक्ष प्रदान करने वाली मानी जाती है और इसके माहात्म्य को पढ़ने या सुनने से भी पुण्य प्राप्त होता है।

वरुथिनी एकादशी की तिथि

वरुथिनी एकादशी की तिथि 3 मई की रात 11 बजकर 24 मिनट से शुरू होगी और यह 4 मई की रात 8 बजकर 38 मिनट पर समाप्त होगी। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, वरुथिनी एकादशी का व्रत 4 मई को रखना उचित होगा। धन्यवाद! अगर आपको और कुछ जानना हो तो बताइए।

पौराणिक कथा
वरुथिनी एकादशी की कथा के मुताबिक, प्राचीन काल में नर्मदा नदी के किनारे राजा मांधाता का शासन था. राजा मांधाता बहुत दानवीर और धर्मात्मा थे. एक बार जब राजा जंगल के पास तपस्या कर रहे थे, तब वहां एक भालू आया और उनके पैर को चबाने लगा. राजा तपस्या में लीन थे, इसलिए भालू उन्हें घसीटकर जंगल में ले गया. घायल राजा ने अपने प्राणों की रक्षा के लिए भगवान विष्णु से प्रार्थना की. भगवान विष्णु ने उनकी प्रार्थना को स्वीकार कर भालू को अपने चक्र से मार गिराया, लेकिन भालू के वार से राजा अपंग हो गए. राजा को बहुत दुख हुआ और कष्टों का सामना करना पड़ा. तब भगवान विष्णु ने कहा कि राजा अपने पुराने कर्मों का फल भोग रहे हैं. उन्होंने राजा से कहा कि वे मथुरा जाकर वैशाख महीने के कृष्ण पक्ष की एकादशी का व्रत रखें और वराह अवतार की पूजा करें. ऐसा करने से दुख दूर होंगे और सभी कष्टों से छुटकारा मिलेगा. राजा ने भगवान की आज्ञा मानकर वरुथिनी एकादशी का व्रत किया और उनके अंग फिर से सुंदर और संपूर्ण हो गए. इसी एकादशी के प्रभाव से राजा स्वर्ग गए थे. 

वरुथिनी एकादशी का महत्व

वरुथिनी एकादशी का महत्व बहुत अधिक है। यह एकादशी वैशाख माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को मनाई जाती है. इस दिन भगवान विष्णु की पूजा की जाती है. इस एकादशी के व्रत का पालन करने से व्यक्ति को सुख, समृद्धि, सौभाग्य प्राप्त होता है, और सभी पाप कर्मों का नाश होता है.

इस व्रत को पूर्ण करने से कन्या दान करने और हजारों वर्षों का तप करने के समान पुण्य की प्राप्ति होती है. इस व्रत के प्रभाव से राजा मान्धाता को स्वर्ग की प्राप्ति हुई थी. इस व्रत के महात्म्य को पढ़ने से एक हजार गोदान का फल मिलता है.

इस एकादशी के व्रत को जो मनुष्य विधिवत करते हैं उन्हें तमाम कष्टों से मुक्ति मिलती है और उनके सभी पाप कर्मों का नाश होता है. इसके अलावा ये व्रत व्यक्ति को सुख समृद्धि और सौभाग्य भी प्रदान करता है. इस व्रत को पूर्ण करने से कन्या दान करने और हजारों वर्षों का तप करने के समान पुण्य की प्राप्ति होती है.

डिसक्लेमर

‘इस लेख में दी गई जानकारी/सामग्री/गणना की प्रामाणिकता या विश्वसनीयता की गारंटी नहीं है। सूचना के विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/धार्मिक मान्यताओं/धर्मग्रंथों से संकलित करके यह सूचना आप तक प्रेषित की गई हैं। हमारा उद्देश्य सिर्फ सूचना पहुंचाना है, पाठक या उपयोगकर्ता इसे सिर्फ सूचना समझकर ही लें। इसके अतिरिक्त इसके किसी भी तरह से उपयोग की जिम्मेदारी स्वयं उपयोगकर्ता या पाठक की ही होगी।’

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