- झिरना रेंज के ग्रासलैंड में अकेला मिला था हाथी का बच्चा, शरीर पर थीं मामूली चोटें
- कैंप में रखकर किया गया प्राथमिक उपचार, सेहत सुधरते ही चलाया गया मिलन अभियान
- मां के सामने आते ही वनकर्मियों ने छोड़ा बाहर, झुंड ने खुशी-खुशी अपनाया

रामनगर (उत्तराखंड) उत्तराखंड के रामनगर स्थित कॉर्बेट टाइगर रिजर्व (CTR) से वन्यजीव संरक्षण की एक बेहद सुखद और मानवीय तस्वीर सामने आई है। झिरना रेंज के घास के मैदान में अपने कुनबे से बिछड़े एक घायल हाथी के बच्चे को वन विभाग ने न केवल सुरक्षित बचाया, बल्कि बेहतर इलाज के बाद उसे उसकी मां और पूरे झुंड से दोबारा मिला दिया है।
कार्बेट प्रशासन की इस संवेदनशीलता और सतर्कता के कारण यह पूरा रेस्क्यू ऑपरेशन पूरी तरह सफल रहा।
मामले की जानकारी देते हुए कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के पार्क वार्डन बिंदर पाल सिंह ने बताया कि झिरना रेंज के ग्रासलैंड क्षेत्र में वनकर्मियों की नियमित गश्त चल रही थी। इसी दौरान उन्हें हाथी का एक छोटा बच्चा अकेला भटकता हुआ मिला। उस समय आसपास हाथियों का कोई झुंड मौजूद नहीं था। बच्चे के शरीर पर कुछ मामूली चोटें भी थीं।
परिस्थिति की गंभीरता को देखते हुए पार्क प्रशासन की टीम ने तत्काल रेस्क्यू कर बच्चे को झिरना कैंप परिसर पहुंचाया।
कैंप परिसर में वन्यजीव डॉक्टरों और वनकर्मियों की टीम ने बच्चे का प्राथमिक उपचार शुरू किया। उसके खान-पान और देखभाल का विशेष ध्यान रखा गया, जिससे उसकी हालत में तेजी से सुधार होने लगा। पार्क वार्डन के अनुसार, वन विभाग का प्राथमिक उद्देश्य बच्चे को केवल ठीक करना नहीं, बल्कि उसे वापस उसकी मां और प्राकृतिक आवास तक पहुंचाना था।
पार्क प्रशासन लगातार उस इलाके की निगरानी कर रहा था, जहां हाथियों के झुंड की हलचल थी। जल्द ही हाथियों का एक झुंड कैंप के पास आ पहुंचा, जिसमें बच्चे की मां भी मौजूद थी।
सही मौका देखते ही वनकर्मियों ने हाथी के बच्चे को कैंप से बाहर छोड़ दिया। बाहर आते ही मां ने बिना देर किए बच्चे को पहचान लिया और अपने पास बुला लिया। इसके बाद पूरा झुंड बच्चे को अपने बीच सुरक्षित लेकर जंगल की गहराई में चला गया।
पार्क वार्डन बिंदर पाल सिंह ने बताया कि हाथी का बच्चा अब अपने परिवार के साथ जंगल में सामान्य रूप से घूम रहा है। इसके बावजूद कॉर्बेट प्रशासन लगातार उस झुंड की मॉनिटरिंग कर रहा है, ताकि बच्चे की सुरक्षा और स्वास्थ्य पर नजर बनी रहे।
वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि समय पर रेस्क्यू, वैज्ञानिक निगरानी और सही इलाज से बिछड़े वन्यजीवों को उनके प्राकृतिक परिवार से दोबारा जोड़ा जा सकता है, यह अभियान इसकी एक मिसाल है।
