
मुख्य बिंदु (Highlights):
- सरयू नदी में अस्थि विसर्जन: अमेरिकी प्रोफेसर रॉबर्ट केटलेट की आखिरी इच्छा पूरी करने उनकी जापानी पत्नी मियाको केटलेट (ताओमी) बागेश्वर पहुंचीं।
- 2005 में हुई थी मुलाकात: वर्ष 2005 में बागेश्वर के योग साधना शिविर में अमेरिका के प्रोफेसर रॉबर्ट और जापान की प्रोफेसर मियाको की पहली मुलाकात हुई थी।
- अमर प्रेम की अनूठी मिसाल: 2009 में शादी के बाद दोनों जापान में रहे; 2022 में ब्रेन हैमरेज से रॉबर्ट का निधन हो गया था।
- विधि-विधान से हुआ पूजन: बागेश्वर के तट पर पंडितों ने 45 मिनट तक मंत्रोच्चार कर पूजन कराया, जिसके बाद अस्थियां सरयू में प्रवाहित की गईं।
बागेश्वर (उत्तराखंड). देवभूमि उत्तराखंड की अध्यात्म और प्राकृतिक सुंदरता न केवल भारतीयों बल्कि विदेशियों के दिलों को भी छू लेती है। बागेश्वर जिले से पति-पत्नी के अटूट प्रेम और श्रद्धा की एक ऐसी ही भावुक कर देने वाली कहानी सामने आई है। जापान से बागेश्वर पहुंची एक महिला ने अपने दिवंगत अमेरिकी पति की अंतिम इच्छा पूरी करते हुए उनकी अस्थियों को पवित्र सरयू नदी की धारा में प्रवाहित किया।
इस अमर प्रेम कहानी की शुरुआत साल 2005 में हुई थी। अमेरिका में अंग्रेजी के प्रोफेसर रॉबर्ट केटलेट बागेश्वर घूमने आए थे। यहाँ एक योग साधना शिविर के दौरान उनकी मुलाकात जापान की रहने वाली मियाको (घरेलू नाम ताओमी) से हुई, जो स्वयं जापान में अंग्रेजी की प्रोफेसर थीं।
धीरे-धीरे दोनों की दोस्ती प्यार में बदली और मियाको के आग्रह पर रॉबर्ट 2007 में अमेरिका से जापान शिफ्ट हो गए। 2007 में दोनों दोबारा बागेश्वर आए और यहाँ की आध्यात्मिकता व शांत वादियों ने रॉबर्ट के दिल में गहरी छाप छोड़ी। इसके बाद साल 2009 में दोनों ने विवाह कर लिया और जापान में रहने लगे।
साल 2022 में प्रोफेसर रॉबर्ट केटलेट को ब्रेन हैमरेज (Brain Hemorrhage) हुआ। लंबे इलाज के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका। मृत्यु से पहले रॉबर्ट ने अपनी पत्नी मियाको से इच्छा जताई थी कि उनके निधन के बाद उनकी अस्थियों को बागेश्वर की पवित्र सरयू नदी में विसर्जित किया जाए।
पति के निधन के बाद मियाको गहरे मानसिक आघात और बीमारी से जूझती रहीं, लेकिन उनके मन में पति का अंतिम वचन जीवित रहा। उन्होंने संकल्प लिया कि चाहे कितनी भी दूरी क्यों न हो, वे अपने जीवनसाथी की आखिरी इच्छा जरूर पूरी करेंगी।
अपने परिजनों के साथ जापान से बागेश्वर पहुंचीं मियाको ने सरयू नदी के तट पर स्थानीय पुरोहितों के साथ विधि-विधान से पूजा-अर्चना की। करीब पौने घंटे (45 मिनट) तक चले वैदिक मंत्रोच्चार के बीच रॉबर्ट की अस्थियां पवित्र सरयू नदी में विसर्जित की गईं।
जब सरयू की लहरों में रॉबर्ट की अस्थियां विलीन हुईं, तो मियाको और उनके परिजन अत्यंत भावुक हो उठे। अमेरिका से शुरू होकर जापान और फिर बागेश्वर तक का यह सफर केवल एक यात्रा नहीं, बल्कि दो दिलों के उस पवित्र बंधन की कहानी है जो मृत्यु के बाद भी अटूट रहा।
