
- विस्थापन और कानूनी लड़ाई: 2011 में उजड़ा था ऐतिहासिक हाट गांव, 140 परिवारों को किया गया विस्थापित; कई प्रभावित आज भी कोर्ट के चक्कर काट रहे।
- आंदोलन करने पर ग्रामीणों पर मुकदमे: 2012, 2014 और 2019 में उठे थे विरोध के स्वर; अदालत से ग्रामीणों को मिली थी राहत।
- सुरक्षा मानकों पर गंभीर सवाल: स्थानीय जनप्रतिनिधियों का आरोप- पिछले साल लोको ट्रॉली हादसे और बार-बार मलबा गिरने के बाद भी लापरवाह बना रहा प्रबंधन; स्वतंत्र जांच की मांग।
चमोली / पीपलकोटी: पीपलकोटी में टीएचडीसी (THDC) की निर्माणाधीन टनल में हुए दर्दनाक हादसे के बाद 444 मेगावाट की ‘विष्णुगाड-पीपलकोटी जल विद्युत परियोजना’ एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है। यह परियोजना अपने शुरुआती दौर से ही भूमि अधिग्रहण, जबरन विस्थापन, पर्यावरणीय अनदेखी और धार्मिक-सांस्कृतिक धरोहरों को नुकसान पहुंचाने को लेकर विवादों में घिरी रही है। स्थानीय ग्रामीणों और पूर्व जनप्रतिनिधियों का आरोप है कि कंपनी प्रबंधन ने न तो पर्यावरण और सुरक्षा मानकों पर ध्यान दिया और न ही पूर्व में हुए हादसों से कोई सबक सीखा, जिसका खामियाजा आज बेकसूर मजदूरों को अपनी जान देकर भुगतना पड़ा है।
2009 से शुरू हुआ विरोध, 2011 में उजड़ा हाट गांव
ग्रामीणों के अनुसार, परियोजना निर्माण के दौरान न तो स्थानीय जनता को विश्वास में लिया गया और न ही संवेदनशील हिमालयी पर्यावरण की परवाह की गई।
- 140 परिवारों का विस्थापन: वर्ष 2009 में जब भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू हुई, तभी से ग्रामीणों ने पुरजोर विरोध किया। आपत्तियों को दरकिनार करते हुए वर्ष 2011 में ऐतिहासिक हाट गांव के करीब 140 परिवारों को विस्थापित कर दिया गया।
- धार्मिक-सांस्कृतिक नुकसान: परियोजना के कारण सदियों पुराने धार्मिक व सांस्कृतिक स्थलों पर असर पड़ा, जिसे लेकर कई प्रभावित परिवार आज भी न्याय की उम्मीद में न्यायालय की शरण में हैं।
आवाज उठाने पर ग्रामीणों पर ठोके मुकदमे
परियोजना के खिलाफ जब-जब स्थानीय ग्रामीणों ने अपने हक और पर्यावरण की रक्षा के लिए आवाज उठाई, तब-तब प्रबंधन ने दमनकारी रुख अपनाया।
- हाट गांव के ग्रामीणों ने वर्ष 2012, 2014 और 2019 में बड़े आंदोलन किए।
- कंपनी प्रबंधन ने ग्रामीणों की मांगों को सुनने के बजाय उनके खिलाफ थानों में मुकदमे दर्ज करवा दिए। हालांकि, बाद में अदालत से प्रभावित परिवारों को राहत मिली।
हादसों से नहीं सीखा सबक: लोको ट्रॉली दुर्घटना के बाद भी सुरक्षा में लापरवाही
हाट गांव के पूर्व ग्राम प्रधान राजेंद्र हटवाल और पूर्व ज्येष्ठ उपप्रमुख पंकज हटवाल ने टनल की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर आरोप लगाए हैं।
- पहले भी गिर चुका था मलबा: जनप्रतिनिधियों का कहना है कि जिस टनल में हालिया हादसा हुआ, उसमें पहले भी कई बार मलबा और पानी रिसने की घटनाएं हो चुकी थीं।
- लोको ट्रॉली हादसा भूला प्रबंधन: पिछले वर्ष टनल के भीतर हुए लोको ट्रॉली हादसे के बाद भी सुरक्षा ऑडिट नहीं कराया गया। अगर पूर्व की इन चेतावनियों को गंभीरता से लिया जाता, तो इतने बड़े हादसे को टाला जा सकता था।
स्वतंत्र उच्चस्तरीय जांच की मांग
स्थानीय लोगों और जनप्रतिनिधियों ने मांग की है कि टनल हादसे की जांच केवल विभागीय स्तर पर न कराकर किसी स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति (Independent Committee) से कराई जाए। साथ ही परियोजना क्षेत्र में कार्यरत सभी श्रमिकों की सुरक्षा की गारंटी, पर्यावरणीय नियमों की सख्ती से पालना और विस्थापित परिवारों के पुनर्वास व अधिकारों की तुरंत समीक्षा की जाए।
