- हाईकोर्ट के 2018 के आदेश में बदलाव: रूपकुंड, दयारा, बेदनी समेत प्रमुख ट्रेक पर फिर से शुरू हो सकेंगी कैंपिंग और नाइट स्टे की गतिविधियां।
- अर्थव्यवस्था को मिलेगा बूस्ट: ट्रेक गाइड, पोर्टर, होमस्टे और घोड़ा-खच्चर संचालकों की बढ़ेगी कमाई; ATOAI ने सालाना 533 करोड़ के नुकसान का जताया था अनुमान।
- सीएम धामी बोले: विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन जरूरी; प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने चेताया- कचरा प्रबंधन और प्लास्टिक नियंत्रण पर रखनी होगी कड़ी नजर।

देहरादून: उत्तराखंड के उच्च हिमालयी घास के मैदानों यानी बुग्यालों में एडवेंचर और हाई एल्टीट्यूड पर्यटन को लेकर करीब आठ साल से चली आ रही पाबंदियों पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से बड़ा बदलाव आया है। सुप्रीम कोर्ट ने बुग्यालों में रात्रि प्रवास (नाइट कैंपिंग) और पर्यटकों की संख्या को लेकर लगी प्रमुख पाबंदियों में संशोधन करते हुए राहत दी है। इससे प्रदेश के एडवेंचर टूरिज्म और दूरस्थ सीमांत गांवों की अर्थव्यवस्था को नई संजीवनी मिलने की उम्मीद है। हालांकि, पर्यावरण और बुग्यालों की नाजुक पारिस्थितिकी को बचाते हुए पर्यटन को बढ़ावा देना सरकार और स्थानीय प्रशासन के लिए सबसे बड़ी परीक्षा होगी।
2018 में हाईकोर्ट ने क्यों लगाया था प्रतिबंध?
साल 2018 में नैनीताल हाईकोर्ट ने ‘अली-बेदनी-बगजी बुग्याल संरक्षण समिति’ की याचिका पर ऐतिहासिक फैसला सुनाया था।
- अदालत ने बुग्यालों की नाजुक पारिस्थितिकी (Ecosystem), अनियंत्रित पर्यटकों की भीड़, प्लास्टिक कचरा, मिट्टी के कटाव और बढ़ते प्रदूषण को देखते हुए व्यावसायिक चराई, स्थायी निर्माण और रात्रि प्रवास (Night Stay) पर पूरी तरह रोक लगा दी थी।
- साथ ही एक समय में पर्यटकों की संख्या 200 तक सीमित करने के सख्त आदेश दिए गए थे।
प्रतिबंध से पर्यटन और स्थानीय आजीविका को भारी नुकसान
रात्रि प्रवास पर रोक लगने से हाई एल्टीट्यूड ट्रेकिंग उद्योग बुरी तरह प्रभावित हुआ था:
- रूपकुंड ट्रेक का उदाहरण: वन विभाग के अनुसार, 2017-18 में जहां 6,108 ट्रेकर्स रूपकुंड पहुंचे थे और 40.14 लाख रुपये का राजस्व मिला था, वहीं 2018-19 में प्रतिबंध के बाद राजस्व घटकर मात्र 25 लाख रुपये (सितंबर तक केवल 2.67 लाख) रह गया।
- 533 करोड़ के नुकसान का अनुमान: एडवेंचर टूर ऑपरेटर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (ATOAI) के अनुसार, नाइट स्टे पर रोक से गाइड, कुक, पोर्टर, ढाबा-होटल संचालक, खच्चर संचालक और टैक्सी चालकों समेत स्थानीय आजीविका को करीब 533 करोड़ रुपये का संभावित नुकसान हुआ था।
फैसले से क्या बदलेगा? किन ट्रेक रूटों को मिलेगा फायदा
हाई एल्टीट्यूड वाले ऐसे ट्रेक रूट जिन्हें एक दिन में पूरा करना संभव नहीं था, वहां अब नियमबद्ध तरीके से कैंपिंग हो सकेगी:
- चमोली: रूपकुंड, अली बुग्याल, बेदनी बुग्याल, बगजी, पनार और औली के पास स्थित गोरसों बुग्याल।
- उत्तरकाशी: दयारा बुग्याल (बटर फेस्टिवल के लिए प्रसिद्ध), गिडारा, गुलाबी कांठा, केदारकांठा और चाईंशील बुग्याल।
- टिहरी गढ़वाल: पंवाली कांठा, कुश कल्याण और नागटिब्बा क्षेत्र।
- रुद्रप्रयाग: चोपता और तुंगनाथ-चंद्रशिला से जुड़े मीडोज।
- पिथौरागढ़: मुनस्यारी स्थित खलिया टॉप बुग्याल।
- देहरादून: चकराता क्षेत्र का मोइला टॉप बुग्याल।
क्या होते हैं बुग्याल?
बुग्याल हिमालय में ट्री-लाइन (पेड़ों की सीमा) से ऊपर स्थित प्राकृतिक अल्पाइन घास के मैदान हैं। गर्मियों में ये हरी घास, दुर्लभ जड़ी-बूटियों और रंग-बिरंगे मौसमी फूलों से ढक जाते हैं, जबकि सर्दियों में बर्फ की चादर ओढ़ लेते हैं। ये न केवल पर्यटन का केंद्र हैं, बल्कि स्थानीय पशुपालकों के पारंपरिक चरागाह और संवेदनशील हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र का अहम हिस्सा भी हैं।
“फैसले का स्वागत, इकोनॉमी और इकोलॉजी में संतुलन रहेगा”“यह फैसला बेहद स्वागतपूर्ण है। हमारी हमेशा कोशिश रहती है कि प्रदेश में विकास और पर्यटन का ऐसा मॉडल लागू हो, जिसमें इकोनॉमी (अर्थव्यवस्था) और इकोलॉजी (पर्यावरण) के बीच सही संतुलन बना रहे।”— पुष्कर सिंह धामी, मुख्यमंत्री, उत्तराखंड
“इको टूरिज्म के नए रास्ते खुलेंगे”“हाईकोर्ट के प्रतिबंध से पर्यटन पर बुरा असर पड़ा था। सरकार लगातार इसे बहाल करने का प्रयास कर रही थी। अब नाइट कैंपिंग की छूट मिलने से इको-टूरिज्म को बढ़ावा मिलेगा।”— सुबोध उनियाल, वन मंत्री, उत्तराखंड
“स्थानीय लोगों की आय बढ़ाना मुख्य लक्ष्य”“पिछले साल करीब डेढ़ लाख ट्रेकर्स उत्तराखंड पहुंचे थे, जिनमें 3,000 विदेशी पर्यटक थे। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद संख्या में और इजाफा होगा। हमारा प्रयास है कि पर्यटक स्थानीय होमस्टे और ग्रामीणों पर खर्च करें, ताकि स्थानीय आर्थिकी मजबूत हो।”— धीराज सिंह गर्ब्याल, पर्यटन सचिव
“छूट मिली है, खुली छूट नहीं; कचरा प्रबंधन जरूरी”“बुग्यालों में पर्यटकों की आवाजाही बढ़ने के साथ प्लास्टिक निस्तारण और ठोस अपशिष्ट प्रबंधन बड़ी चुनौती होगी। स्थानीय प्रशासन को निगरानी रखनी होगी ताकि पर्यावरण नियमों की अनदेखी न हो।”— पराग मधुकर धकाते, सदस्य सचिव, राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड
TV10 INDIA विश्लेषण: असली परीक्षा अब शुरू—बुग्याल भी बचें और पर्यटन भी बढ़े
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को ‘बिना नियमन की खुली छूट’ के रूप में नहीं देखा जा सकता। यदि भारी भीड़ को अनियंत्रित छोड़ दिया गया और कचरा प्रबंधन के ठोस नियम लागू नहीं हुए, तो बुग्यालों की नाजुक पारिस्थितिकी दोबारा संकट में पड़ सकती है। सरकार के लिए जरूरी होगा कि कैरिंग कैपेसिटी (वहन क्षमता), बायो-टॉयलेट्स, प्लास्टिक बैन और स्थानीय प्रशासन की कड़ी निगरानी के साथ ही इको-फ्रेंडली ट्रेकिंग को आगे बढ़ाया जाए।
