
देहरादून। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून और उसके आसपास के क्षेत्रों में नाबालिग बच्चों के लापता होने के मामलों में लगातार हो रही बढ़ोतरी गंभीर चिंता का विषय बनती जा रही है। पिछले महज 10 दिनों के भीतर देहरादून के विभिन्न थानों में 13 बच्चों की गुमशुदगी के मुकदमे दर्ज कराए गए हैं। इन मामलों ने समाज, पुलिस और अभिभावकों के सामने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मनोचिकित्सकों का मानना है कि सोशल मीडिया का अनियंत्रित प्रभाव और परिवारों में बातचीत की कमी बच्चों को इस तरह के आत्मघाती कदम उठाने पर मजबूर कर रही है।
खबर से जुड़े मुख्य बिंदु (Key Highlights):
- चिंताजनक आंकड़े: पिछले 10 दिनों के भीतर ऋषिकेश से लेकर पछुवादून के सेलाकुई और सहसपुर तक कुल 13 नाबालिग बच्चों की गुमशुदगी दर्ज।
- उम्र और लिंग: लापता होने वाले बच्चों की उम्र 12 से 18 वर्ष के बीच है, जिनमें सबसे अधिक संख्या नाबालिग लड़कियों की है।
- स्थानीय आक्रोश: पछुवादून क्षेत्र में बाहरी राज्यों से आने वाले मजदूरों व कामगारों का पुलिस सत्यापन न होने से स्थानीय लोगों में नाराजगी है।
- पुलिस का रेस्क्यू रेट: देहरादून पुलिस के अनुसार, बीते एक साल में गुमशुदा हुए बच्चों में से 93% को सुरक्षित बरामद किया जा चुका है।
वर्चुअल दुनिया की अपेक्षाएं और कम होती सहनशीलता
विशेषज्ञों के अनुसार, आजकल बच्चे छोटी-छोटी बातों पर नाराज होकर घर छोड़ने जैसा बड़ा कदम उठा रहे हैं। दून मेडिकल कॉलेज अस्पताल की मनोचिकित्सक डॉ. जया नवानी का कहना है कि सोशल मीडिया पर दिखाई जाने वाली चकाचौंध और काल्पनिक जीवनशैली से प्रभावित होकर बच्चे अपनी इच्छाएं और अपेक्षाएं बढ़ा लेते हैं। जब परिवार में उनकी मांगें पूरी नहीं होतीं, तो वे आवेश में आकर गलत निर्णय ले लेते हैं।
इसके साथ ही, बच्चों में सहनशीलता की कमी और माता-पिता के साथ संवाद का घटना भी इसके मुख्य कारणों में शामिल है।
नाबालिग लड़कियों की गुमशुदगी और स्थानीय लोगों का गुस्सा
हाल के दिनों में सेलाकुई और सहसपुर जैसे औद्योगिक क्षेत्रों में कई नाबालिग लड़कियों के लापता होने के मामले सामने आए हैं। इन घटनाओं को लेकर स्थानीय निवासियों में काफी रोष है। लोगों का आरोप है कि बाहरी राज्यों से आकर काम कर रहे लोगों का उचित सत्यापन (Verification) नहीं किया जा रहा है। कुछ मामलों में यह भी देखा गया है कि आसपास के क्षेत्रों में काम करने वाले विशेष समुदाय के युवक नाबालिग लड़कियों को बहला-फुसलाकर ले जा रहे हैं, जिससे सामाजिक संतुलन और सुरक्षा को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
‘घर बच्चों के लिए भावनात्मक सुरक्षा का केंद्र होना चाहिए’
मनोचिकित्सक डॉ. जया नवानी ने बच्चों की मानसिक स्थिति पर प्रकाश डालते हुए कहा—
“आज के दौर में बच्चों पर डिजिटल कंटेंट का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है। समस्या यह है कि बच्चों को उनकी मानसिक परिपक्वता से पहले ऐसा कंटेंट देखने को मिल रहा है, जिसे सही तरीके से समझने की क्षमता उनमें विकसित नहीं हुई है। जब बच्चों को परिवार में पर्याप्त संवाद, अपनापन और भावनात्मक सहयोग नहीं मिलता, तो उनका झुकाव बाहर की दुनिया की ओर बढ़ने लगता है। घर बच्चों के लिए केवल रहने की जगह नहीं, बल्कि भावनात्मक सुरक्षा का केंद्र होना चाहिए।”
पुलिस का पक्ष: ‘93% मामलों में बच्चों को सकुशल ढूंढा गया’
इस पूरे संवेदनशील मामले पर देहरादून के एसएसपी प्रमेंद्र डोबाल का कहना है—
“बच्चों के लापता होने की सूचना मिलते ही पुलिस तत्काल मुकदमा दर्ज कर उनकी तलाश में जुट जाती है। पिछले एक साल के आंकड़ों को देखें तो गुमशुदा हुए बच्चों में से 93 प्रतिशत बच्चों को सकुशल ढूंढ लिया गया है और बाकी बच्चों की तलाश जारी है।”
एसएसपी ने यह भी स्वीकार किया कि सोशल मीडिया के साथ-साथ औद्योगिक क्षेत्रों का सामाजिक वातावरण भी इस तरह की घटनाओं के लिए जिम्मेदार है। उन्होंने अपील की है कि इसे रोकने के लिए माता-पिता, समाज और पुलिस तीनों को मिलकर एक टीम की तरह काम करने की जरूरत है।
